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मंदसौरः गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य में गिद्धों की हुई वृद्धि, 1013 गिद्धों के साथ बना सुरक्षित ठिकाना

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मंदसौरः गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य में गिद्धों की हुई वृद्धि, 1013 गिद्धों के साथ बना सुरक्षित ठिकाना


मंदसौर , 22 फ़रवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित गाँधीसागर वन्यप्राणी अभयारण्य एक बार फिर गिद्धों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। 'प्रदेशव्यापी गिद्ध गणना 2025-26' के तहत रविवार को संपन्न हुई, जिसमें यहां कुल 1013 गिद्ध पाए गए हैं।

गणना का निरीक्षण मुख्य वन संरक्षक उज्जैन वृत्त, आलोक पाठक एवं वनमंडलाधिकारी मंदसौर, संजय रायखेरे द्वारा किया गया। बताया गया कि गाँधीसागर अभयारण्य केवल स्थानीय गिद्धों का ही नहीं, बल्कि विदेशी प्रजातियों का भी पसंदीदा ठिकाना है। गणना में पाए गए हिमालयन ग्रिफन, यूरेशियन ग्रिफन और सिनेरियस जैसे गिद्ध लंबी दूरी तय कर यहाँ पहुँचते हैं। ये मुख्य रूप से तिब्बत, मध्य एशिया, और हिमालय की ऊँचाइयों से शीतकाल के दौरान प्रवास करते हैं। ये प्रवासी गिद्ध आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर के महीने में गाँधीसागर पहुँचते हैं और गर्मी शुरू होने से पहले यानी मार्च-अप्रैल तक यहाँ रुकते हैं।

1. स्थानीय निवासी (4 प्रजातियाँ):

ये गिद्ध वर्ष भर अभयारण्य में रहते हैं और यहीं प्रजनन करते हैं:

भारतीय गिद्ध : चंबल की ऊँची चट्टानों पर घोंसले बनाने वाली मुख्य प्रजाति।

सफेद पीठ वाला गिद्ध : पेड़ों पर बसेरा करने वाले ये गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं।

राज गिद्ध : अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट लाल सिर वाली प्रजाति।

मिस्र का गिद्ध : आकार में छोटे और सफेद रंग के स्थानीय गिद्ध।

विदेशी मेहमान/प्रवासी (3 प्रजातियाँ):

ये प्रजातियाँ शीतकाल (अक्टूबर-नवंबर से मार्च-अप्रैल) के दौरान तिब्बत, मध्य एशिया और हिमालय की ऊँचाइयों से प्रवास कर यहाँ पहुँचती हैं:

हिमालयन ग्रिफन : हिमालय के ठंडे क्षेत्रों से आने वाले विशालकाय गिद्ध।

यूरेशियन ग्रिफन : लंबी दूरी तय कर आने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रवासी।

सिनेरियस गिद्ध : दुनिया के सबसे भारी और बड़े गिद्धों में शुमार।

गाँधीसागर ही क्यों है 'गिद्धों का स्वर्ग'?

निरीक्षण के दौरान डीएफओ संजय रायखेरे ने बताया कि सुरक्षित चट्टानें चंबल नदी के किनारे स्थित ऊँची और दुर्गम चट्टानें गिद्धों को सुरक्षित घोंसले बनाने और प्रजनन के लिए आदर्श स्थान प्रदान करती हैं। प्रचुर भोजन और जल: अभयारण्य में वन्यजीवों की अच्छी संख्या और आस-पास के क्षेत्रों में पशुधन की उपलब्धता के कारण इन्हें पर्याप्त भोजन मिलता है। चंबल का पानी इनके लिए बारहमासी जल स्रोत है। मानवीय हस्तक्षेप मुक्त: अभयारण्य का शांत वातावरण और सुरक्षित कॉरिडोर इनके फलने-फूलने में मदद करता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया