home page

मप्र जनजातीय संग्रहालय में पांच दिवसीय महुआ महोत्सव का हुआ शुभारंभ

 | 
मप्र जनजातीय संग्रहालय में पांच दिवसीय महुआ महोत्सव का हुआ शुभारंभ


मप्र जनजातीय संग्रहालय में पांच दिवसीय महुआ महोत्सव का हुआ शुभारंभ


मप्र जनजातीय संग्रहालय में पांच दिवसीय महुआ महोत्सव का हुआ शुभारंभ


- महोत्सव में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ शिल्प-व्यंजन मेला और कठपुतली प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण भी

भोपाल, 06 जून (हि.स.)। मध्य प्रदेश में संस्कृति विभाग द्वारा भोपाल में जनजातीय जीवन, देशज ज्ञान परम्परा और सौन्दर्यबोध एकाग्र मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय की स्थापना के तेरहवें वर्षगाँठ समारोह के अवसर पर शनिवार की शाम पांच दिवसीय ’महुआ महोत्सव’ का भव्य शुभारंभ हुआ।

मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, श्यामला हिल्स, भोपाल में 06 से 10 जून, 2026 तक आयोजित महोत्सव जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी एवं उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र- प्रयागराज के संयुक्त तत्त्वाधान में एवं दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र- नागपुर के सहयोग से किया जा रहा।

महोत्सव की शुरूआत दीप प्रज्जवलन एवं कलाकारों के स्वागत से किया गया। इस अवसर पर पद्मश्री भूरी बाई, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी, विधायक उमाकांत भार्गव, संस्कृति संचालकएन.पी.नामदेव, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी के निदेशक डॉ धर्मेंद्र पारे एवं दर्शकों की गरिमामय उपस्थिति में महोत्सव का शुभारंभ हुआ।

महोत्सव में स्वागत उद्बोधन संस्कृति संचालक एन.पी.नामदेव द्वारा दिया गया। वहीं मंत्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी ने मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय के तेरहवें वर्षगांठ समारोह आमंत्रण पर पधारे देश के अलग-अलग राज्यों के कलाकारों का स्वागत करते हुए कहा कि विभाग द्वारा प्रदेश की संस्कृति और उसकी कलाओं को लोकव्यापी बनाने के प्रयत्न निरंतर किये जा रहे हैं। देश का एक मात्र जनजातीय संग्रहालय है जहां एक ही स्थान पर प्रदेश की जनजातियों क्रमशः गोण्ड, बैगा, भील, कोरकू, भारिया, सहरिया और कोल जनजातियों के पारम्परिक आवासों को संग्रहालय परिसर में वर्तमान परिवेश के दृष्टिगत परिकल्पित कर जनजातीय कलाकारों से ही निर्मित करा जाकर प्रदर्शित किया गया है।

उन्होंने कहा कि कलात्मक कार्यों के माध्यम से संग्रहालय में आने वाला दर्शक सिर्फ दीर्घाओं में ही देखने के सुख का अनुभव ना करें बल्कि इस संग्रहालय के पूरे परिवेश और निर्मिति में भी वह देखने के रस का अनुभव कर सके। लगातार इस अनुरूप निर्माण के कार्य अलग-अलग जातीय समुदायों के कलाकारों के माध्यम से कराये जाते हैं। इन्हीं कलात्मक कार्यों के चलते यह संग्रहालय आज प्रदेश की विशेष धरोहर बनता जा रहा है। महोत्सव में आभार उद्बोधन निदेशक, अकादमी डॉ धर्मेंद्र पारे द्वारा किया गया।

महोत्सव के शुभारंभ दिवस पर सोनू कुशवाहा एवं साथी, बैतूल द्वारा कोरकू जनजतीय गदली नृत्य की प्रस्तुति दी गई। गदली नृत्य विवाह के अवसर पर किया जाने वाला कोरकू स्त्रियों का नृत्य है। पुरुष बाँसुरी, अलगोझा, ढोल, ढोलक, टिमकी और झाँझ बजाते हैं। बाँसुरी और अलगोझा की लोक धुन पर स्त्रियाँ हाथों में चिटकोरा बजाती हुईं विभिन्न मुद्राओं में बहुत ही आकर्षक व मनमोहक नृत्य करती हैं। पुरुष वादक भी मस्ती में झूम-झूमकर नृत्य करते हुए वाद्यों को गति प्रदान करते हैं। जैसे-जैसे वाद्यों की गति बढ़ती है, नृत्य में भी उतना निखार आता जाता है। धीरे-धीरे नृत्य जब तीव्र होने के साथ ही साथ अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो बहुत ही लुभावना और दर्शनीय होता है। रात-रात भर होने वाला कोरकू स्त्रियों का बहुत ही लोकप्रिय नृत्य है।

वहीं अगले क्रम में राजा लोहगुण्डी गोण्डवानी आख्यान आधारित नृत्य-नाट्य की प्रस्तुति हुई। नृत्य- नाट्य का निर्देशन सतीश व्याम,भोपाल, आलेख योगेश तिवारी, रीवा एवं संगीत एच.अनिल सिंह द्वारा किया गया है। नृत्य नाट्य में बताया गया कि राजा लोहगुण्डी ने अपने शौर्य पराक्रम से गोंडवाना राज्य का विस्तार किया एवं प्रजा का पालन किया। राजा का विवाह बाल अवस्था में राजा पंचनारायण की पुत्री हीरोली कन्या से हो गया था परंतु दुष्ट राजा रामदरबाई हिरोली कन्या को अगवा कर बंदी बना लेता है, तो राजा लोहगुण्डी अपने बल बुद्धि से जादुई राजा रामदरबाई को पराजित कर कन्या हिरोली को वापस ले आते हैं और अपने राज्य का विस्तार करते हैं। इस नाट्य को 20 दिवस के पूर्वाभ्यास में तैयार किया गया हैं, जिसमें 50 से अधिक कलाकार शामिल रहे। इस नाट्य को बेहतर बनाने के लिए गोंड संस्कृति और परंपरा से प्रेरित हो कर वेशभूषा,नृत्य एवं संगीत का संयोजन किया गया है। नाटक में 11 दृश्य रहे और कुल अवधि 1:20 मिनट की रही।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर