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पाप कर्म से दूर रहकर धर्म के प्रति श्रद्धा रखें : आचार्य सागरचंद्रसागरजी

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पाप कर्म से दूर रहकर धर्म के प्रति श्रद्धा रखें : आचार्य सागरचंद्रसागरजी


मंदसौर, 03 अगस्त (हि.स.)। आर्यरक्षित जैन तीर्थ, चंद्रपुरा में परम पूज्य जैन आचार्य अशोक सागरजी महाराज की निश्रा में आयोजित धर्मसभा में आचार्य सागरचंद्रसागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्म, संयम और सदाचार का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखनी चाहिए और जैसे-जैसे श्रद्धा बढ़े, वैसे-वैसे पाप कर्मों से दूरी भी बढ़नी चाहिए।

आचार्य सागरचंद्रसागरजी ने कहा कि मनुष्य के मन में पाप कर्म के प्रति भय होना आवश्यक है। यदि व्यक्ति यह भाव रखे कि पाप कर्म का परिणाम वर्तमान जीवन में दुख और भविष्य में दुर्गति के रूप में भोगना पड़ सकता है, तो वह स्वयं ही अधर्म के मार्ग से दूर रहेगा। उन्होंने कहा कि यही भय व्यक्ति को पाप से बचाकर कल्याण के मार्ग पर अग्रसर करता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में संयम धारण करने वाले प्रत्येक साधु-साध्वी के प्रति सम्मान और अनुमोदना का भाव रखना चाहिए। किसी ने भी जिस भावना से दीक्षा ग्रहण की हो, उसके बारे में अनावश्यक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दीक्षा के बाद संयममय जीवन अत्यंत कठिन होता है, लेकिन उसी मार्ग पर चलकर साधारण से साधारण जीव भी उच्च आध्यात्मिक अवस्था और मोक्ष की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

अपने प्रवचन में आचार्य ने अभिमुक्त मुनि का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि अकाल के समय एक भिक्षुक ने भोजन की प्राप्ति के उद्देश्य से दीक्षा ग्रहण की थी। दीक्षा के बाद उसकी मृत्यु हो गई, लेकिन संयम और साधु-संघ के प्रति उत्कृष्ट भाव के कारण उसे अगले जन्म में श्रेष्ठ गति प्राप्त हुई। बाद में उसने पुनः संयम धारण कर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग अपनाया।

उन्होंने मुनि अतिमुक्ति का प्रसंग भी सुनाया। आचार्य ने बताया कि एक बालक ने साधु पात्रों की सुंदरता से प्रभावित होकर दीक्षा लेने का निर्णय लिया। प्रारंभ में अज्ञानवश उसने पात्रों के साथ बालसुलभ व्यवहार किया, लेकिन गुरु के मार्गदर्शन और आत्मचिंतन से वह ज्ञान के उच्च शिखर तक पहुंचा। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि संयमियों के प्रति सदैव श्रद्धा और सम्मान का भाव रखना चाहिए।

धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। प्रवचन के उपरांत कमल कोठारी परिवार ने सहधर्मी स्वामी वात्सल्य का लाभ लिया। इस अवसर पर आचार्य सागरचंद्रसागरजी ने कोठारी परिवार को वासक्षेप प्रदान कर मंगल आशीर्वाद दिया।

हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया