शहडोल: पुरखों से मिले देसी बीजों को सहेजकर रख रहीं बिरमतिया बैगा, आज भी जीवित है पारंपरिक खेती की विरासत
शहडोल, 25 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के मझगवां गांव के सलैया टोला निवासी बिरमतिया बैगा के लिए देसी बीज केवल खेती का साधन नहीं, बल्कि उनके पुरखों की पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा की अनमोल धरोहर हैं। वह अपने खेतों में पारंपरिक धान और मोटे अनाज की विभिन्न किस्मों की खेती कर रही हैं। फसल से प्राप्त अनाज का उपयोग परिवार के भोजन में होता है, जबकि सुरक्षित रखे गए बीज अगली फसल तैयार करने में काम आते हैं।
खेतों में संजोकर रखी हैं पारंपरिक फसलों की किस्में
बिरमतिया बैगा के खेतों में समा, कुटकी, सिकिया, काकुन, सरैय्या और ठर्री धान जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती हैं। अलग-अलग मौसम में इन फसलों की खेती करना और उनसे प्राप्त अनाज को सुरक्षित रखना उनके परिवार की पुरानी परंपरा का हिस्सा है।
उनके लिए खेत में उगने वाला प्रत्येक अनाज केवल उपज नहीं है। उसके साथ परिवार की यादें, पूर्वजों की खेती की पद्धति और वर्षों से चली आ रही खाद्य परंपरा जुड़ी हुई है। वे पुराने बीजों को संभालकर रखती हैं, ताकि अगली फसल के समय उन्हीं बीजों को फिर से खेत में बोया जा सके।
एक फसल से अगली फसल तक सुरक्षित रहती है परंपरा
बिरमतिया बैगा के परिवार में खेत से प्राप्त अनाज का उपयोग भोजन के लिए किया जाता है। समा, कुटकी, सिकिया और काकुन जैसे अनाज उनके पारंपरिक खानपान का हिस्सा हैं। वहीं सरैय्या और ठर्री जैसी धान की किस्में उनकी खेती में विविधता बनाए रखती हैं।
उनके यहां बीज संरक्षण की परंपरा एक मौसम की फसल के साथ समाप्त नहीं होती। फसल तैयार होने के बाद उसके अनाज का उपयोग किया जाता है और अगले मौसम की बुवाई के लिए बीज सुरक्षित रखे जाते हैं। इस तरह पुरानी किस्में एक फसल से दूसरी फसल और एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुंचती रहती हैं।
देसी बीजों में बसती है परिवार की खुशहाली
बिरमतिया बैगा के लिए अपने खेत में उगाया अनाज जब घर की रसोई तक पहुंचता है, तो उसमें उनकी मेहनत के साथ अपनेपन का एहसास भी जुड़ा होता है। घर में सुरक्षित रखा अनाज परिवार की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है। वहीं बीजों को बचाकर रखना भविष्य की खेती के लिए भरोसे का आधार है।
उनकी यह पहल बताती है कि पारंपरिक बीजों का संरक्षण केवल किसी एक परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि स्थानीय कृषि परंपरा और जैव विविधता को बचाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। आधुनिक खेती के दौर में भी बिरमतिया बैगा अपने पुरखों से मिली इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेगी देसी अनाज की पहचान
मझगवां के सलैया टोला में बिरमतिया बैगा द्वारा सहेजे गए बीज इस बात का प्रमाण हैं कि पारंपरिक खेती आज भी ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा है। इन बीजों को सुरक्षित रखकर वे आने वाली पीढ़ियों के लिए देसी फसलों की पहचान बचाए रखने में योगदान दे रही हैं।
उनके लिए सबसे बड़ी खुशी यही है कि पुरखों से मिले बीज आज भी खेतों में बोए जाते हैं, फसल बनकर घर आते हैं और परिवार के भोजन का हिस्सा बनते हैं। यही परंपरा, मेहनत और आत्मनिर्भरता उनकी खुशहाल जिंदगी की असली कहानी है।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला

