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भोपाल: न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर अस्थायी श्रमिकों का धरना, भाजपा कार्यालय के बाहर की नारेबाजी

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भोपाल: न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर अस्थायी श्रमिकों का धरना, भाजपा कार्यालय के बाहर की नारेबाजी


- उमा भारती की 2003 की घोषणा याद दिलाई

भोपाल, 28 सितम्बर (हि.स.) । मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर अस्थायी, अंशकालीन, चौकीदार और ठेका श्रमिकों ने सोमवार को भाजपा प्रदेश कार्यालय के बाहर धरना दिया। 3 से 8 हजार रुपए तक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा के सामने नारेबाजी करते हुए ‘न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन’ शुरू किया।

प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती की ओर से की गई घोषणा की याद दिलाई। कर्मचारियों का कहना है कि प्रदेश में घोषित न्यूनतम मजदूरी और उन्हें मिल रहे वास्तविक भुगतान के बीच बड़ा अंतर है।

अस्थायी, आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने बताया कि राज्य सरकार ने न्यूनतम मजदूरी 12,425 से 16,769 रुपए प्रति माह घोषित की है। उनका दावा है कि इसके बावजूद सरकारी विभागों में कई कर्मचारियों से 3 से 5 हजार रुपए में काम कराया जा रहा है। शर्मा के मुताबिक औद्योगिक क्षेत्रों में भी ठेका श्रमिकों को पूरी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही है। इससे अस्थायी और ठेका कर्मचारियों में नाराजगी है। उन्होंने बताया कि आंदोलन की पूर्व सूचना बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को पत्र के माध्यम से दी गई थी।

वासुदेव शर्मा ने बताया कि आंदोलन में करीब 11 वर्गों के कर्मचारी शामिल हो रहे हैं। इनमें ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य, सफाईकर्मी और लोकल यूथ सर्वेयर प्रमुख हैं। उनका कहना है कि कुछ कर्मचारियों को सिर्फ 2 से 3 हजार रुपए महीने मिल रहे हैं। शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों और छात्रावासों में काम करने वाले अंशकालीन व अस्थायी कर्मचारी भी आंदोलन में शामिल होंगे। शर्मा का आरोप है कि इन कर्मचारियों से 4 से 5 हजार रुपए के भुगतान पर 10 से 12 घंटे तक काम लिया जा रहा है।

कर्मचारियों के अनुसार विभिन्न विभागों और योजनाओं में काम करने वाले कर्मचारियों को मिलने वाला मासिक भुगतान इस प्रकार है-

स्कूल, छात्रावास और आयुष विभाग के अंशकालीन/अस्थायी कर्मचारी: 4 से 5 हजार रुपए।

ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य और सफाईकर्मी: 3 से 4 हजार रुपए।

स्वास्थ्य विभाग के चतुर्थ श्रेणी आउटसोर्स कर्मचारी: 7 से 8 हजार रुपए।

राजस्व विभाग के लोक यूथ सर्वेयर: 1 हजार रुपए।

आदिवासी पंचायतों में पेसा मोबिलाइजर: 4 हजार रुपए।

कोटवार: 2 से 5 हजार रुपए। कर्मचारियों का दावा है कि इनसे सेवा भूमि भी वापस ली जा रही है।

स्कूलों के मध्याह्न भोजन कार्यकर्ता: 4 हजार रुपए।

मनरेगा के मेट श्रमिक: 2 हजार रुपए से भी कम।

योग सहायक एवं प्रशिक्षक: 4,500 रुपए।

स्वच्छताग्राही: बिना वेतन भुगतान किए हटा दिए गए।

औद्योगिक क्षेत्र, पावर प्लांट और सीमेंट उद्योग: ठेका श्रमिकों को पूरी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलने का दावा।

कर्मचारी मोर्चा ने बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को भेजे पत्र में कहा है कि प्रदेश की मेहनतकश जनता वर्ष 2003 से लगातार भाजपा सरकार को चुनती आ रही है। पत्र में दावा किया गया है कि पिछले 23 साल में चपरासी तक की स्थायी नौकरी नहीं दी गई। पत्र में कहा गया है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियों को पूरी तरह खत्म कर उन्हें अस्थायी और आउटसोर्स व्यवस्था में बदल दिया गया है। कर्मचारियों का कहना है कि ये नौकरियां गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी, ओबीसी और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम थीं।

कर्मचारियों ने पत्र में यह भी कहा है कि अस्थायी और आउटसोर्स नौकरियों में न तो रोजगार की स्थिरता है और न ही सम्मानजनक वेतन। उनके मुताबिक वर्ष 2003 से पहले मिलने वाली सरकारी नौकरियों में सेवा सुरक्षा का प्रावधान था, लेकिन अब बड़ी संख्या में कर्मचारियों को कम वेतन पर अस्थायी व्यवस्था में काम करना पड़ रहा है। कर्मचारियों ने मांग की है कि सरकार घोषित न्यूनतम मजदूरी के अनुरूप भुगतान सुनिश्चित करे और अस्थायी व आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए रोजगार की स्थिरता तथा सम्मानजनक वेतन की व्यवस्था करे।

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हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत