home page

भोपाल: जेपी आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा सिंह पंचतत्व में विलीन

 | 
भोपाल: जेपी आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा सिंह पंचतत्व में विलीन


भोपाल, 20 अप्रैल (हि.स.)। सादगी, प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकारों से भरा एक लंबा जीवन आज स्मृतियों में बदल गया। जेपी आंदोलन से जुड़ीं और जीवनभर समाज व प्रकृति के पक्ष में खड़ी रहीं सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा सिंह (81) सोमवार को पंचतत्व में विलीन हो गईं।

भोपाल के भदभदा घाट पर उनका अंतिम संस्कार गो काष्ठ से किया गया। एक ऐसा निर्णय, जो उनके पर्यावरण के प्रति गहरे लगाव को भी दर्शाता है। मुखाग्नि छोटे पुत्र अमन नम्र ने दी। उनका निधन रविवार सुबह हुआ था।

अनुराधा सिंह केवल एक नाम नहीं थीं, बल्कि एक विचार, एक जीवन दृष्टि थीं। वे सर्वोदय परंपरा के प्रमुख विचारक आचार्य राममूर्ति की पुत्री और मध्यप्रदेश के ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता व शिक्षाविद श्यामबहादुर नम्र की पत्नी थीं। इस वैचारिक विरासत को उन्होंने केवल आगे बढ़ाया ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में पूरी ईमानदारी से जिया।

उनके अंतिम संस्कार में दैनिक भास्कर समूह के कई वरिष्ठ पत्रकारों के साथ-साथ एकलव्य, विकास संवाद सहित अनेक सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। हर व्यक्ति के पास उनसे जुड़ी कोई न कोई स्मृति थी—उनकी सहजता, उनकी शांत दृढ़ता और बिना किसी शोर के काम करते रहने का उनका स्वभाव।

अनुराधा सिंह का जीवन संघर्षों और सरोकारों से गहराई से जुड़ा रहा। जेपी आंदोलन के दौर में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और सामाजिक परिवर्तन के उस दौर की साक्षी बनीं। इसके बाद भी उनका जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ। जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों—विशेषकर बड़े बांधों और विस्थापन के सवालों—पर वे लगातार सक्रिय रहीं। उनके लिए ये केवल मुद्दे नहीं, बल्कि जीवन के प्रश्न थे।

वे मानती थीं कि विकास का अर्थ केवल निर्माण नहीं, बल्कि संतुलन भी है—मनुष्य और प्रकृति के बीच, जरूरत और लालच के बीच। यही कारण था कि उन्होंने अपने जीवन में सादगी को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि उसे एक संदेश की तरह जिया।

पिछले करीब डेढ़ दशक से वे भोपाल में अपने छोटे बेटे, दैनिक भास्कर डिजिटल के कार्यकारी संपादक अमन नम्र के साथ रह रही थीं। उनके बड़े बेटे अनुराग सिंह देश के जाने-माने डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर हैं, जिनके काम में भी कहीं न कहीं उसी संवेदनशील दृष्टि की झलक मिलती है, जो उन्हें अपनी मां से विरासत में मिली।

अनुराधा सिंह को जानने वाले कहते हैं कि वे भीड़ में नहीं, लोगों के बीच काम करती थीं। उन्होंने कभी मंच नहीं मांगा, लेकिन जहां भी अन्याय या असंतुलन दिखा, वहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उनके लिए सामाजिक कार्य कोई पेशा नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक विस्तार था।

उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे दौर की स्मृति का धुंधला पड़ना भी है, जिसमें विचार, संघर्ष और सादगी एक साथ चलते थे। सर्वोदय और पर्यावरण के क्षेत्र में उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

आज जब उन्हें अंतिम विदाई दी गई, तो केवल एक शरीर पंचतत्व में विलीन नहीं हुआ—एक विचार, एक संवेदना और एक प्रतिबद्ध जीवन भी हमारे बीच से विदा हुआ। लेकिन उनकी विरासत, उनके मूल्य और उनके संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला