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‘अंतर्जली’ से जल गंगा संवर्धन अभियान को मिली वैज्ञानिक शक्ति, भूजल प्रबंधन और जल गुणवत्ता आकलन होगा अधिक सटीक

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‘अंतर्जली’ से जल गंगा संवर्धन अभियान को मिली वैज्ञानिक शक्ति, भूजल प्रबंधन और जल गुणवत्ता आकलन होगा अधिक सटीक


भोपाल, 08 जून (हि.स.)। मध्य प्रदेश में जल संवर्धन और सतत पर्यावरण प्रबंधन के लिए जल गंगा संवर्धन अभियान संचालित किया जा रहा है। इसको वैज्ञानिक एवं तकनीकी आधार प्रदान करने की दिशा में मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जल स्रोतों के संरक्षण, पुनर्जीवन एवं भूजल प्रबंधन को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से मैपकास्ट द्वारा विभिन्न वैज्ञानिक दस्तावेज और एटलस तैयार किए जा रहे हैं।

दरअसल इसी क्रम में जल गंगा संवर्धन अभियान वर्ष 2026 के अंतर्गत मैपकास्ट द्वारा उपग्रह छायाचित्रों पर आधारित महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दस्तावेज भूजल एटलस “अंतर्जली” तैयार किया गया है। इसके तहत भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर एवं जबलपुर जिलों के भूजल एटलस तैयार कर संबंधित विभागों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसे भूजल प्रबंधन और जल गुणवत्ता का आंकलन प्रभावी होगा।

जलजनित स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान और निराकरण में मिलेगी सहायता

जनसंपर्क अधिकारी जूही श्रीवास्तव ने साेमवार काे जानकारी देते हुए बताया कि मैपकास्ट ने राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केन्द्र (एनआरएससी)-इसरो, हैदराबाद के तकनीकी मार्गदर्शन में आधुनिक रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस तकनीकों का उपयोग करते हुए विस्तृत भूजल मानचित्र तैयार किए हैं। इन मानचित्रों के संकलन से “अंतर्जली” एटलस का निर्माण किया गया है। यह वैज्ञानिक दस्तावेज उन्नत डिजिटल एलिवेशन मॉडल, लीनियामेंट विश्लेषण और लिथोलॉजिकल डेटा के समेकित अध्ययन के आधार पर किया गया है।

उन्हाेंने बताया कि एटलस में भूजल संभावना मानचित्र एवं भूजल गुणवत्ता मानचित्र शामिल किए गए हैं, जिससे जल प्रबंधन से जुड़े विभागों को वैज्ञानिक एवं डेटा आधारित निर्णय लेने में सहायता मिलेगी। इसके माध्यम से फ्लोराइड, नाइट्रेट, रासायनिक प्रदूषण और भारी धातुओं की उपस्थिति का क्षेत्रवार विश्लेषण भी उपलब्ध कराया गया है। इससे जलजनित स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान और उनके निराकरण में सहायता मिलेगी।

जल संबंधी नीति निर्माण और योजना क्रियान्वयन में होगा उपयोगी

उन्हाेंने बताया कि यह एटलस जल संसाधन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, ग्रामीण विकास एवं कृषि सहित जल क्षेत्र से जुड़े विभिन्न शासकीय एवं अर्द्धशासकीय संस्थानों के लिए नीति निर्माण एवं योजना क्रियान्वयन में उपयोगी सिद्ध होगा। साथ ही जल विज्ञान, पर्यावरण अध्ययन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में कार्यरत वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और शिक्षाविदों के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोगी होगा।

उल्लेखनीय है कि मैपकास्ट द्वारा वर्ष 2024 में उज्जैन की जल संरचनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन कर “शिप्रा अमृता का आहवान” दस्तावेज तैयार किया गया था। इसके अंतर्गत तालाबों, बांधों एवं जलाशयों का विस्तृत विश्लेषण कर एटलस विकसित किया गया था। इसी प्रकार प्रदेश के अन्य जिलों के लिए भी एटलस तैयार करने की प्रक्रिया जारी है।

मैपकास्ट द्वारा वर्ष 2025 में प्रदेश की सभी नदियों की मैपिंग कर “अमृतम् जलम्” नामक चार खंडों में दस्तावेज प्रकाशित किया गया था। इसमें प्रदेश की नर्मदा, सोन, तपती, चंबल, शिप्रा, बेतवा, केन और वेनगंगा नदी बेसिन और उनकी 1,550 सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों और प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे