थाने की 'कैद' से जिनालय के सिंहासन तक: शिवपुरी में 800 साल पुरानी आदिनाथ प्रतिमा का अनूठा सफर
शिवपुरी, 04 फ़रवरी (हि.स.)। मध्य प्रदेश के शिवपुरी शहर में यह केवल एक पुरातत्विक खोज नहीं, बल्कि आस्था और धैर्य की एक मार्मिक गाथा है। शिवपुरी की धरती से निकली 12वीं शताब्दी की भगवान आदिनाथ की प्रतिमा, जो तीन वर्षों तक कोतवाली थाने के परिसर में 'सुरक्षित' रखी गई थी, अब भक्ति के उल्लास के बीच अपने दिव्य सिंहासन पर विराजमान होने जा रही है।
इस कहानी की शुरुआत 18 मार्च 2020 को हुई, जब शिवपुरी में झांसी रोड पर एक छात्रावास की नींव खुदाई के दौरान बलुआ पत्थर से निर्मित 26 इंच की भगवान आदिनाथ की प्रतिमा प्रकट हुई। प्रतिमा के साथ 10 अन्य विखंडित हिस्से भी मिले, जो इस क्षेत्र की प्राचीन गौरवशाली जैन संस्कृति का प्रमाण थे।
प्रतिमा के मिलते ही जैन समाज की भावनाएं उमड़ पड़ीं, लेकिन कानून और पुरातत्व विभाग के नियमों के चलते इसे सरकारी संरक्षण में ले लिया गया था। तीन साल तक यह प्राचीन प्रतिमा कोतवाली थाने के हनुमान मंदिर परिसर में रही। समाज की इस पीड़ा को मुनि पदम सागर महाराज ने स्वर दिया, जिसके बाद एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ।
जैन समाज के निरंतर संघर्ष और दस्तावेजों की मजबूती को देखते हुए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और कलेक्टर रविंद्र कुमार चौधरी ने संवेदनशीलता दिखाई। आखिरकार, 20 मार्च 2023 का वह ऐतिहासिक दिन आया जब विधि-विधान के साथ यह प्रतिमा समाज को सौंप दी गई।
संवत 1220 (12वीं-13वीं शताब्दी) की इस खड़गासन प्रतिमा का जीर्णोद्धार उड़ीसा के विशेष मूर्तिकारों द्वारा किया गया है। चंदा प्रभु जिनालय ट्रस्ट जैन समाज के अध्यक्ष सूरज जैन के अनुसार, प्राचीन काल में प्रतिमा की आंखें बंद थीं, जिन्हें अब कारीगरों ने बेहद सूक्ष्मता से खोलकर प्रतिमा को नया और अलौकिक स्वरूप प्रदान किया है।
अब यह प्राचीन वैभव चंद्रप्रभु जिनालय की शोभा बढ़ा रहा है। 5 से 8 फरवरी तक आयोजित होने वाले पंचकल्याणक महोत्सव में इस प्रतिमा की पूर्ण विधि-विधान से प्रतिष्ठा की जाएगी, जो शिवपुरी के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज होगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / युगल किशोर शर्मा

