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हिंदू समाज को अपनी पहचान और परंपराओं के प्रति जागरूक होना जरूरी : स्वामी सत्यनारायण

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हिंदू समाज को अपनी पहचान और परंपराओं के प्रति जागरूक होना जरूरी : स्वामी सत्यनारायण


हिंदू समाज को अपनी पहचान और परंपराओं के प्रति जागरूक होना जरूरी : स्वामी सत्यनारायण


हिंदू समाज को अपनी पहचान और परंपराओं के प्रति जागरूक होना जरूरी : स्वामी सत्यनारायण


हिंदू समाज को अपनी पहचान और परंपराओं के प्रति जागरूक होना जरूरी : स्वामी सत्यनारायण


रांची के तीन स्थानों पर विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन

रांची, 15 मार्च (हि.स.)। हिंदू समाज की एकता, जागरण और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से रांची में तीन स्थानों पर रविवार को विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। इनमें टाटीसिल्वे, डोरण्डा और कडरू कपिलदेव मैदान मे विराट हिंदू सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया।

महानगर में आयोजित इन सम्मेलनों में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में संगठन की भावना को मजबूत करना, सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और राष्ट्रहित में समाज की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना था। कार्यक्रम में समाज से आए बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। तीनों कार्यक्रम मे लगभग 1100 से अधिक लोगों की सहभागिता ने इस आयोजन को अत्यंत सफल और प्रेरणादायी बना दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार, हवन और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद मंचासीन अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ और अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए वक्ताओं ने समाज, संस्कृति, संगठन और राष्ट्र के विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए स्वामी सत्यनारायण सौमित्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल संदेश धर्मो रक्षति रक्षितः है। उन्होंने कहा कि जब समाज अपने धर्म, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा करता है, तभी धर्म भी उसकी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को अपनी पहचान, अपने इतिहास और अपनी परंपराओं के प्रति जागरूक होना जरूरी है। यदि समाज संगठित और जागृत रहेगा तो कोई भी शक्ति उसे कमजोर नहीं कर सकती। उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा लेकर समाज और राष्ट्र के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

स्वामी सौमित्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति सहिष्णुता, समरसता और मानवता का संदेश देती है, लेकिन इसके साथ-साथ समाज को अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के प्रति भी सजग रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के समय में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को समझना अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करेगा तो राष्ट्र स्वतः मजबूत होगा।

कार्यक्रम में निशा उरांव ने सरना और सनातन परंपराओं के संबंध पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आदिवासी समाज और सनातन समाज की जड़ें एक ही सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ही परंपराएं प्रकृति को पूजनीय मानती हैं और धरती को माता के रूप में सम्मान देती हैं।

निशा उरांव ने कहा कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता है। अलग-अलग पूजा पद्धतियों और परंपराओं के बावजूद सभी का लक्ष्य मानवता, प्रकृति और समाज के प्रति सम्मान की भावना को बढ़ाना है। सम्मेलन में अन्य वक्ताओं ने भी समाज के विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज में आपसी सहयोग, समरसता और संगठन की भावना को मजबूत किया जाए। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज की शक्ति उसकी एकता में है। जब समाज एकजुट होकर आगे बढ़ता है, तभी वह किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम होता है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के महानगर कार्यवाह दीपक ने अपने संबोधन में सामाजिक समरसता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि जाति, वर्ग या क्षेत्र के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव समाज को कमजोर करता है।

भारतीय संस्कृति का मूल संदेश सर्वे भवन्तु सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम् है, जो पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। इसलिए सभी को मिलकर समाज में समानता और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।

कार्यक्रम में परिवार व्यवस्था और संस्कारों के महत्व पर भी विस्तृत चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि परिवार ही समाज की आधारशिला है। यदि परिवार मजबूत होगा तो समाज और राष्ट्र भी मजबूत होंगे। बच्चों और युवाओं को भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति की भावना से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। माता-पिता और परिवार के वरिष्ठ सदस्यों की जिम्मेदारी है कि वे नई पीढ़ी को अच्छे संस्कार दें और उन्हें अपने इतिहास और परंपराओं से परिचित कराएं।

सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण के विषय पर भी महत्वपूर्ण विचार रखे गए। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव से प्रकृति के संरक्षण और संतुलित जीवन का संदेश देती आई है। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और धरती को माता के रूप में सम्मान देने की परंपरा भारत की सांस्कृतिक पहचान है।

कार्यक्रम में स्वदेशी जीवनशैली, भारतीय भाषा, वेशभूषा और भोजन के महत्व पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हमें अपनी मातृभाषा, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं पर गर्व होना चाहिए। भारतीय वेशभूषा, भोजन और जीवन पद्धति केवल परंपरा ही नहीं बल्कि हमारे सांस्कृतिक आत्मसम्मान का प्रतीक भी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे