विद्यार्थी विश्वविद्यालय से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात कर समाज निर्माण में निभाएं भूमिका : डॉ शैलेश
रांची, 09 अगस्त (हि.स.)। विदाई शिक्षा-यात्रा का अंत नहीं, बल्कि जीवन के नए अध्याय की शुरुआत है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय से प्राप्त ज्ञान, संस्कार और अनुशासन को जीवन में आत्मसात् कर समाज एवं राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं। ये बातें राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, रांची के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ शैलेश कुमार मिश्र ने कहीं। वह रविवार को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू) के संस्कृत विभाग में स्नातकोत्तर द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों के लिए आयोजित विदाई समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा, संस्कृति और जीवन-मूल्यों की संवाहिका है। संस्कृत के विद्यार्थियों पर इस परम्परा को समझने, संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का विशेष दायित्व है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलसचिव और संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ धनंजय वासुदेव द्विवेदी ने कहा कि स्नातक और स्नातकोत्तर की परीक्षाओं में प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम से पूछे जाते हैं, लेकिन जीवन की परीक्षा के प्रश्न प्रायः ‘आउट ऑफ सिलेबस’ होते हैं। जीवन में परिस्थितियां बिना पूर्व सूचना के प्रश्न बनकर सामने आती हैं। उनके उत्तर पुस्तकीय ज्ञान के साथ विवेक, धैर्य, आत्मविश्वास और अनुभव के आधार पर देने पड़ते हैं।
वहीं मारवाड़ी महाविद्यालय, रांची के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ राहुल कुमार ने कहा कि उपाधि शिक्षा की पूर्णता नहीं, बल्कि ज्ञान की व्यापक यात्रा का एक पड़ाव है। संस्कृत का अध्ययन भाषा-साहित्य के साथ भारतीय संस्कृति, दर्शन और जीवन-मूल्यों से जोड़ता है। विद्यार्थियों को अर्जित ज्ञान समाजोपयोगी बनाना चाहिए।
इस अवसर पर हैप्पी, अनिशा, निधि, चन्द्रावती, दीप, वर्षा, निकिता, कल्याणी, पल्लवी, गुलाची, कृति, निराली और निशा ने विभिन्न समूहों में नृत्य प्रस्तुत किए। मंच संचालन प्रतिमा चौहान एवं सचिन कुमार ने किया।
समारोह में आशीष कुमार, प्रवीण कुमार, नीरज कुमार और मनीष कुमार सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / Vinod Pathak

