डिंडाकोली दुर्गा मंदिर में 304 वर्षों से हो रही मां की आराधना, 10 दिनों तक चलता है अनुष्ठान
देवघर, 13 अक्टूबर (हि.स.)। जिले के करौं प्रखंड क्षेत्र स्थित प्रसिद्ध डिंडाकोली दुर्गा मंदिर में पिछले 304 वर्षों से मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। ऐतिहासिक मान्यताओं और परंपराओं से जुड़ा यह मंदिर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। खास बात यह है कि जहां आसपास के अधिकांश दुर्गा मंदिरों में तीन दिनों तक पूजा-अर्चना होती है, वहीं डिंडाकोली दुर्गा मंदिर में 10 दिनों तक विशेष अनुष्ठान किया जाता है। पूरे नवरात्र में यहां अनवरत चिराग जलाने की परंपरा भी निभाई जाती है।
मंदिर की स्थापना को लेकर स्थानीय बुजुर्गों के बीच प्रचलित मान्यता के अनुसार, संताल विद्रोह के दौरान इस इलाके में विद्रोहियों के हमले की योजना बनी थी। इसकी जानकारी गांव के लोगों को पहले ही मिल गई। अनहोनी की आशंका से भयभीत ग्रामीण मां दुर्गा के दरबार में पहुंचे और अपनी प्राण रक्षा की गुहार लगाई। ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि यदि मां की कृपा से गांव की रक्षा हुई, तो वे भव्य मंदिर का निर्माण कर मां की प्रतिमा स्थापित करेंगे।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इसके बाद विद्रोही गांव की सीमा से ही लौट गए और गांव पर हमला नहीं हुआ। इस घटना को मां की कृपा मानते हुए ग्रामीणों ने मंदिर में प्रतिमा स्थापित कर विधिवत पूजा-अर्चना शुरू की। हालांकि, यह विवरण स्थानीय जनश्रुति और मान्यता पर आधारित है।
मंदिर की महत्ता को लेकर एक अन्य जनश्रुति भी प्रचलित है। बुजुर्गों के अनुसार, पहले गांव के लोग नदी पार कर तालझारी में दुर्गा पूजा करने जाते थे। एक बार भारी बारिश के कारण पूरा क्षेत्र जलमग्न हो गया। पानी के तेज बहाव में मां की प्रतिमा, नवपत्रिका और घट बहने लगे। इसी दौरान डिंडाकोली गांव के लोगों को मां की प्रतिमा मिली। इसके बाद प्रतिमा को स्थापित कर गांव में ही पूजा-अर्चना शुरू की गई।
डिंडाकोली दुर्गा मंदिर में डिंडाकोली के अलावा सुनसुन डबरा, तारापुर, धमना, चिकिनिया, सिंहपुर, छींट डिंडाकोली, प्रतापपुर, सालतर, भेंडो, सियाटांड़, लकरछरा और भलगढ़ा समेत आसपास के कई गांवों के लोगों की गहरी आस्था है। इन गांवों के श्रद्धालु मंदिर में मां की पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर के पुजारी रामदेव सिंह ने बताया कि इन गांवों के लोगों का मंदिर से विशेष जुड़ाव है। नवरात्र के दौरान यहां भक्तिमय माहौल रहता है और दूर-दराज से श्रद्धालु मां के दर्शन एवं पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। 304 वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
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हिन्दुस्थान समाचार / Anup Kumar Roy

