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कोयला कर्मियों के 727 करोड़ डूबने की सीबीआई करेगी जांच, झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर केस दर्ज

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कोयला कर्मियों के 727 करोड़ डूबने की सीबीआई करेगी जांच, झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर केस दर्ज


रांची, 05 नवंबर (हि.स.)। धनबाद के कोल माइंस प्रोविडेंट फंड संगठन के करीब 1,390 करोड़ रुपये के निवेश में भारी वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है।

दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड ( डीएचएफएल) में निवेश के कारण संगठन को 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद सीबीआई की एंटी करप्शन ब्रांच, रांची ने इस मामले में गुरुवार को नियमित प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। एफआईआर में कोल माइंस प्रोविडेंट फंड संगठन (सीएमपीएफओ ) के तत्कालीन कमिश्नर अनिमेष भारती, दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) के तत्कालीन प्रमोटर एवं निदेशक कपिल वाधवान और धीरज वाधवान के अलावा संगठन के अज्ञात अधिकारियों और अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है।

सीबीआई की प्राथमिकी के अनुसार, सीएमपीएफओ ने वर्ष 2015 से 2018 के बीच डीएचएफएल में लगभग 1,390.25 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इस निवेश को लेकर वित्तीय विशेषज्ञों और फंड मैनेजरों ने पहले ही चेतावनी दी थी। उन्हें आशंका थी कि डीएचएफएल की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है और निवेश की गई रकम को वापस निकाल लेना चाहिए।इसके बावजूद सीएमपीएफओ के अधिकारियों ने समय रहते इस चेतावनी पर कार्रवाई नहीं की। आरोप है कि निवेश वापस लेने का प्रस्ताव लगभग छह महीने तक लंबित रखा गया। आखिरकार 20 दिसंबर 2019 को रकम निकालने का प्रस्ताव पारित किया गया। तब तक डीएचएफएल दिवालिया होने की प्रक्रिया यानी रिजॉल्यूशन में जा चुकी थी. इसके बाद सीएमपीएफओ को करीब 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।

इस पूरे मामले को लेकर झारखंड उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि सार्वजनिक भविष्य निधि की इतनी बड़ी रकम के नुकसान के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने गंभीरता से जांच नहीं की। मामले को दबाने और जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने की कोशिश की गई।

झारखंड उच्च न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2026 को अपने आदेश में मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई जांच का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि यह कोई सामान्य वित्तीय नुकसान का मामला नहीं है। करीब 727.67 करोड़ रुपये सार्वजनिक धन का नुकसान हुआ है। ऐसे मामले में स्वतंत्र जांच जरूरी है, ताकि जांच की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा बना रहे। अदालत ने यह भी माना कि केवल विभागीय कार्रवाई इस मामले में पर्याप्त नहीं है। विभागीय जांच और आपराधिक जांच की प्रकृति अलग-अलग होती है। इसलिए मामले की आपराधिक पहलुओं से भी जांच होनी चाहिए।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में सीएमपीएफओ के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जब वित्तीय विशेषज्ञों ने निवेश वापस लेने की सलाह दी थी, तब अधिकारियों ने उस पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की। अदालत ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि इतनी बड़ी रकम के नुकसान के बावजूद सीएमपीएफओ की ओर से मामले को महज व्यावसायिक नुकसान बताने की कोशिश की गई।

अदालत के अनुसार, उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसे तथ्य हैं, जिनकी आपराधिक पहलू से जांच जरूरी है। उच्च न्यायालय ने तत्कालीन क्षेत्रीय आयुक्त पंकज कुमार की ओर से दिए गए उस हलफनामे पर भी सवाल उठाया, जिसमें मामले को केवल व्यावसायिक नुकसान बताते हुए आपराधिक साजिश या विश्वासघात से इनकार किया गया था। अदालत ने निर्देश दिया कि इस तरह दिए गए क्लीन चिट को जांच का आधार नहीं बनाया जाए। सीबीआई के दर्ज प्राथमिकी में तीन नाम शामिल हैं। इनमें निवेश के समय धनबाद स्थित सीएमपीएफओ के तत्कालीन कमिश्नर अनिमेष भारती, डीएचएफएल के तत्कालीन प्रमोटर और निदेशक कपिल वाधवान और डीएचएफएल के तत्कालीन प्रमोटर और निदेशक धीरज वाधवान शामिल है।

इसके अलावा सीएमपीएफओ धनबाद के अज्ञात अधिकारियों और अन्य अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। सीबीआई ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 409 और 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) के साथ 13(1)(डी) और संशोधित धारा 7 के तहत मामला दर्ज किया है।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में सीबीआई को निर्देश दिया कि सीएमपीएफओ के डीएचएफएल में किए गए निवेश और उससे हुए नुकसान की विस्तृत जांच की जाए। यह भी पता लगाया जाए कि इस पूरे मामले में कौन-कौन लोग शामिल थे और किसकी क्या भूमिका रही। अदालत ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि वह सभी संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच करे। संबंधित पक्षों को सीबीआई के साथ पूरा सहयोग करने और सभी जरूरी दस्तावेज एवं रिकॉर्ड उपलब्ध कराने को कहा गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / विकाश कुमार पांडे