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जमशेदपुर में श्रद्धा और सादगी के साथ मना गुड फ्राइडे, चर्चों में उमड़ी भीड़

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जमशेदपुर में श्रद्धा और सादगी के साथ मना गुड फ्राइडे, चर्चों में उमड़ी भीड़


जमशेदपुर में श्रद्धा और सादगी के साथ मना गुड फ्राइडे, चर्चों में उमड़ी भीड़


पूर्वी सिंहभूम, 03 अप्रैल (हि.स.)। यीशु मसीह के बलिदान,प्रेम और क्षमा के संदेश को स्मरण करते हुए शहर भर में गुड फ्राइडे का पर्व शुक्रवार को गहरी आस्था और सादगी के साथ मनाया गया। विभिन्न गिरजाघरों में विशेष प्रार्थना सभाएं आयोजित की गईं, जहां बड़ी संख्या में ईसाई समुदाय के लोग शामिल हुए और मानवता के कल्याण के लिए प्रार्थना की। इसके पूर्व ईसाई समुदाय के लोगों ने शहर के विभिन्न कब्रिस्तान में अपने पूर्वजों के कब्रों की साफ-सफाई की।

शहर के प्रमुख गिरजाघरों, जिनमें सेंट जोसेफ कैथेड्रल गोलमुरी और सेंट मेरी चर्च बिष्टुपुर के साथ-साथ टेल्को, साकची और अन्य इलाकों के चर्चों में सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था। गिरजाघरों का वातावरण पूरी तरह शांत,अनुशासित और भक्तिमय बना रहा।

सुबह से ही श्रद्धालु काले और गहरे रंग के परिधानों में चर्च पहुंचे,जो शोक और आत्ममंथन का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर ‘क्रूस की राह’ (Way of the Cross) का आयोजन किया गया, जिसमें प्रभु यीशु मसीह के अंतिम समय की घटनाओं और उनके द्वारा सहे गए कष्टों को स्मरण किया गया। श्रद्धालुओं ने गीत, भजन और प्रार्थनाओं के माध्यम से उनके त्याग और प्रेम को याद किया।

गिरजाघरों के पादरियों ने बाइबल का पाठ करते हुए यीशु मसीह के क्षमा, करुणा और अहिंसा के संदेश को लोगों तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि गुड फ्राइडे केवल शोक का दिन नहीं,बल्कि आत्मचिंतन और मानवता के लिए समर्पण का भी अवसर है।

मान्यता के अनुसार दोपहर का समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी समय प्रभु यीशु ने क्रूस पर अपने प्राण त्यागे थे। इस दौरान गिरजाघरों में पूर्ण शांति रखी गई और विशेष शोक सभाओं का आयोजन हुआ। कई श्रद्धालुओं ने दिनभर उपवास रखकर विश्व शांति,समाज की भलाई और मानवता की रक्षा के लिए प्रार्थना की।

सुरक्षा के मद्देनजर जिला प्रशासन और पुलिस द्वारा सभी प्रमुख चर्च परिसरों में पुख्ता इंतजाम किए गए थे। कहीं भी किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो, इसके लिए पुलिस बल तैनात रहा और प्रार्थना सभाएं शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुईं।---------------

हिन्दुस्थान समाचार / गोविंद पाठक