बांग्लादेश: ‘उदारवादी मुखौटे’ के पीछे जमात-ए-इस्लामी का कट्टर एजेंडा उजागर
ढाका, 31 जनवरी (हि.स.)। बांग्लादेश की कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी की तथाकथित “मध्यमार्गी” छवि अथवा उदारवादी मुखौटे और उसकी वैचारिक जड़ों के बीच गहरा विरोधाभास सामने आया है। पार्टी के संविधान और व्यवहार का विश्लेषण करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, जमात का मूल सिद्धांत जनता की संप्रभुता नहीं बल्कि ईश्वर की सर्वोच्चता पर आधारित है, और उसका अंतिम लक्ष्य ‘इकामत-ए-दीन’ यानी इस्लाम को जीवन की पूर्ण व्यवस्था के रूप में स्थापित करना है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जमात ने “दोहरी भाषा” की राजनीति में महारत हासिल कर ली है। अंतरराष्ट्रीय मंचों और राजनयिक हलकों में पार्टी के वरिष्ठ नेता संवैधानिक मूल्यों और तत्काल शरीयत लागू न करने की बात करते हैं, ताकि खुद को एक उदार और लोकतांत्रिक संगठन के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
ग्रामीण इलाकों और कस्बों में, जहां चुनावी समर्थन तय होता है, जमात का संदेश नागरिक जिम्मेदारी से ज्यादा धार्मिक आदेश जैसा होता है। यहां वोट देना एक राजनीतिक विकल्प नहीं बल्कि आस्था की कसौटी बना दिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी से जुड़े कई नेता जमात के चुनाव चिह्न ‘दारिपल्ला’ को वोट देने को धार्मिक कर्तव्य और आध्यात्मिक पुरस्कार से जोड़कर प्रचार करते हैं।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि जमात की विचारधारा बांग्लादेश के संवैधानिक मूल्यों—समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव—से मेल नहीं खाती। इसका सबसे स्पष्ट असर महिलाओं को लेकर पार्टी की सोच में दिखता है। पार्टी नेतृत्व ने ऐसे सामाजिक प्रस्तावों की बात की है, जिनमें महिलाओं की कार्य-भागीदारी सीमित करने, उनके आवागमन को नियंत्रित करने और घरेलू भूमिकाओं को प्रोत्साहन देने की सोच शामिल है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह दृष्टिकोण बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरा है, जहां महिलाएं औपचारिक कार्यबल का बड़ा हिस्सा हैं और गारमेंट उद्योग की रीढ़ मानी जाती हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि जमात के नीति-निर्धारण निकायों में महिलाओं का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, जो सार्वजनिक जीवन से महिलाओं को हाशिये पर डालने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष में चेतावनी दी गई है कि यदि जमात नैतिकता पर एकाधिकार स्थापित करने में सफल होती है, तो कानूनी जवाबदेही की जगह वैचारिक कठोरता ले लेगी, जिसका सबसे बड़ा नुकसान बांग्लादेश की बहुलतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को होगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / आकाश कुमार राय

