रेणुका बांध विस्थापितों का फूटा गुस्सा, डांडा-अंबोया में जमीन की निशानदेही बीच में रोकी
नाहन, 17 मार्च (हि.स.)। रेणुका जी बांध परियोजना से प्रभावित विस्थापित परिवारों और प्रशासन के बीच जमीन आवंटन का मामला एक बार फिर गरमा गया है। मंगलवार को डांडा-अंबोया में विस्थापितों को दी जाने वाली जमीन की डिमार्केशन (निशानदेही) के दौरान विस्थापित परिवारों ने भारी नाराजगी जताते हुए प्रक्रिया को बीच में ही रुकवा दिया। विस्थापितों का आरोप है कि उन्हें कागजों में जो जमीन दिखाई गई थी, धरातल पर उसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत और अनुपयुक्त है।
मौके पर स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब विस्थापितों ने पाया कि आवंटित की जाने वाली जमीन के बीचों-बीच स्थानीय निवासियों की निजी भूमि भी शामिल है। इसके कारण मौके पर ही विवाद की स्थिति बन गई और स्थानीय लोगों ने भी इस प्रक्रिया पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। विस्थापित परिवारों ने एकजुट होकर प्रशासन और एचपीपीसीएल के खिलाफ अपना विरोध जताया।
विस्थापितों का कहना है कि प्रशासन ने कागजों में जिस जमीन को कुलाऊ (उपजाऊ/सिंचित) बताया था, वह वास्तव में बंजर और पथरीली निकली। मौके पर न तो पानी की कोई व्यवस्था है और न ही वहां तक पहुंचने के लिए सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। सुविधाओं के अभाव और जमीन की खराब गुणवत्ता के कारण सभी विस्थापित परिवारों ने सर्वसम्मति से इस 248 बीघा जमीन को लेने से साफ इनकार कर दिया और डिमार्केशन छोड़कर वापस लौट गए।
रेणुका बांध विस्थापित संघर्ष समिति के प्रेस सचिव योगी ठाकुर ने कड़े शब्दों में कहा कि विस्थापितों के साथ इस तरह का मजाक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक विस्थापितों को वादे के अनुरूप उचित और उपजाऊ जमीन नहीं दी जाती, तब तक संघर्ष समिति का आंदोलन जारी रहेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / जितेंद्र ठाकुर

