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‘विकसित भारत 2047’ के लिए संतुलित और सतत विकास की जरूरत: प्रो. विवेकानंद तिवारी

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‘विकसित भारत 2047’ के लिए संतुलित और सतत विकास की जरूरत: प्रो. विवेकानंद तिवारी


शिमला, 29 अप्रैल (हि.स.)। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला में “विकसित भारत 2047: विकास की सनातन दृष्टि” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में प्रो. विवेकानंद तिवारी ने कहा कि विकास को केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उनके मुताबिक सनातन दृष्टि में विकास का अर्थ मानव और प्रकृति के बीच संतुलन और सह-अस्तित्व है, जिसमें नैतिकता और संयम को महत्वपूर्ण माना जाता है।

उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा प्रकृति को सर्वोपरि मानती है और मानव को उसका एक हिस्सा मानती है, न कि शोषण करने वाला। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देना जरूरी है और विकास ऐसा होना चाहिए जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चले। उनके अनुसार, यह दृष्टिकोण भोग के बजाय त्याग और संयम पर आधारित है।

प्रो. तिवारी ने कहा कि विकास का उद्देश्य केवल कुछ लोगों की आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग का समग्र कल्याण होना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरा में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह की प्रगति को समान महत्व दिया गया है। इसीलिए विकास को केवल तकनीकी या औद्योगिक उन्नति के रूप में नहीं, बल्कि एक सतत और संतुलित प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत की पहचान केवल एक आर्थिक या राजनीतिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक समृद्ध ज्ञान परंपरा के रूप में रही है। वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग और अर्थशास्त्र जैसी परंपराएं आज भी आधुनिक विकास मॉडल को नैतिक और समावेशी आधार प्रदान कर सकती हैं। उनके अनुसार “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य भी इसी सोच को आगे बढ़ाता है, जिसमें आधुनिक ढांचे के साथ सांस्कृतिक विरासत को साथ लेकर चलने पर जोर दिया गया है।

सेमिनार में यह भी बताया गया कि प्रो. तिवारी की 200 से अधिक पुस्तकें और 300 से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें “भारत भारती सम्मान”, “मालवीय प्रज्ञा सम्मान”, “राष्ट्र गौरव सम्मान” और “महाशक्ति सम्मान” जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। वर्तमान में वे हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में आंबेडकर पीठ के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा