सुप्रीम कोर्ट से हिमाचल सरकार को झटका, डेढ़ लाख कर्मचारियों के वित्तीय लाभों पर पुनर्विचार याचिका खारिज
शिमला, 30 अक्टूबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश में अनुबंध कर्मचारियों के वित्तीय लाभ और वरिष्ठता से जुड़े मामले में सुक्खू सरकार को सर्वोच्च न्यायालय से भी राहत नहीं मिली है। हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट 2024 को लेकर सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज हो गई है। इससे पहले उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में भी सरकार को राहत नहीं मिली थी। करीब डेढ़ लाख कर्मचारियों के हितों से जुड़े इस मामले में विपक्षी दल भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर अधिकारों को टालने का आरोप लगाया है। भाजपा प्रदेश सचिव सुमीत शर्मा ने पात्र कर्मचारियों को वित्तीय लाभ देने की मांग की है। वहीं, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के पूर्व प्रांत महामंत्री डॉ. मामराज पुंडीर ने कानूनी लड़ाई को सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाने के लिए डॉ. देवेन्द्र एटलस को बधाई दी है।
अनुबंध सेवा के आठ साल से दो साल होने तक का मामला
प्रदेश में वर्ष 2003 से अनुबंध आधार पर नियुक्तियां होती रही हैं। शुरुआती वर्षों में कर्मचारियों को आठ वर्ष तक अनुबंध पर रखा जाता था। बाद में यह अवधि सात, पांच, तीन और अंत में दो वर्ष कर दी गई। कर्मचारियों की मांग थी कि नियमितीकरण से पहले अनुबंध पर दी गई सेवा को भी वित्तीय लाभ और वरिष्ठता तय करने में शामिल किया जाए। इस मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने 25 अप्रैल 2026 को संबंधित प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए कर्मचारियों को वित्तीय लाभ और वरिष्ठता देने के निर्देश दिए थे। दरअसल, राज्य सरकार वर्ष 2024 में हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लॉइज एक्ट लेकर आई थी। कर्मचारियों ने इस कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की, जिसे 29 जुलाई 2026 को खारिज कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने कर्मचारियों को वित्तीय लाभ देने के लिए चार महीने का समय दिया था।
राज्य सरकार ने एसएलपी खारिज होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। डॉ. मामराज पुंडीर के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में 27 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने विलंब को क्षमा करते हुए पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। सभी लंबित अंतरिम आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया। मामले का अंतिम निस्तारण 29 अक्टूबर को दर्ज हुआ। डॉ. पुंडीर ने हिमाचल प्रदेश महाविद्यालय शैक्षिक महासंघ के प्रांत अध्यक्ष डॉ. देवेन्द्र एटलस की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई निस्वार्थ भाव से सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाई। उन्होंने इसे कर्मचारी हितों के लिए समर्पित प्रयास बताते हुए डॉ. एटलस को बधाई दी।
भाजपा बोली, आर्थिक तंगहाली का हवाला देकर अधिकार नहीं रोक सकती सरकार
उधर, भाजपा प्रदेश सचिव सुमीत शर्मा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार बार-बार अदालत पहुंचकर कर्मचारियों के वित्तीय लाभों को टालने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार की कर्मचारी विरोधी नीतियों के कारण हजारों कर्मचारियों को अपने वैध वित्तीय लाभ और वरिष्ठता के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। इससे कर्मचारियों को आर्थिक नुकसान और मानसिक परेशानी उठानी पड़ रही है। उन्होंने सवाल किया कि जब अदालतें कर्मचारियों के पक्ष में निर्णय दे चुकी हैं तो सरकार लाभ देने में देरी क्यों कर रही है। शर्मा ने कहा कि आर्थिक तंगहाली का हवाला देकर कर्मचारियों के अधिकारों को अनिश्चितकाल तक नहीं टाला जा सकता। उन्होंने सरकार से अदालती आदेशों का सम्मान करते हुए पात्र कर्मचारियों को वित्तीय लाभ और वरिष्ठता शीघ्र देने की मांग की। डॉ. पुंडीर ने भी सरकार से न्यायिक निर्णयों का सम्मान करने, कर्मचारी संगठनों से संवाद करने और सेवा संबंधी अधिकारों का न्यायसंगत समाधान निकालने की अपील की। भाजपा ने कहा कि वह कर्मचारियों के हितों का मुद्दा उठाती रहेगी।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

