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हिमाचल में पीजी डॉक्टरों के स्टाइपेंड और 40 लाख के सर्विस बॉन्ड पर रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने उठाये सवाल, नीति बदलने की मांग

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हिमाचल में पीजी डॉक्टरों के स्टाइपेंड और 40 लाख के सर्विस बॉन्ड पर रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने उठाये सवाल, नीति बदलने की मांग


शिमला, 12 अक्टूबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश में मेडिकल की पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों के सामने तीन साल की अनिवार्य सेवा, 40 लाख रुपये के बॉन्ड और कम स्टाइपेंड की शर्तें बड़ी चुनौती बन रही हैं। रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) शिमला ने इन शर्तों पर चिंता जताते हुए राज्य सरकार से नीति में बदलाव की मांग की है। एसोसिएशन का कहना है कि इन शर्तों के कारण राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट-पीजी) में बेहतर रैंक हासिल करने वाले अभ्यर्थी हिमाचल के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने से बच सकते हैं।

एसोसिएशन ने चेताया है कि इसका असर पीजी की सीटों पर पड़ सकता है। राज्य में कुछ सीटें खाली रहने या काउंसलिंग के बाद के चरणों में भरे जाने का जोखिम बढ़ सकता है। आरडीए ने सरकार से आगामी नीट-पीजी 2026 काउंसलिंग के अगले चरणों से पहले जरूरी बदलाव करने की अपील की है।

तीन साल की सेवा और 40 लाख रुपये के बॉन्ड पर पुनर्विचार की मांग

आरडीए आईजीएमसी के अनुसार हिमाचल प्रदेश में पीजी करने वाले डॉक्टरों पर तीन साल की अनिवार्य सेवा की शर्त लागू है। इसके साथ 40 लाख रुपये की बॉन्ड देनदारी और देश के दूसरे राज्यों की तुलना में कम स्टाइपेंड की चिंता भी है। एसोसिएशन का कहना है कि इन शर्तों से डॉक्टरों के करियर और आर्थिक स्थिति पर असर पड़ता है। ऐसे में अभ्यर्थी उन राज्यों के मेडिकल कॉलेजों को प्राथमिकता दे सकते हैं, जहां पीजी प्रशिक्षण की शर्तें उनके लिए अधिक अनुकूल हैं।

एसोसिएशन ने सरकार से मौजूदा सर्विस बॉन्ड और 40 लाख रुपये की देनदारी पर दोबारा विचार करने को कहा है। उसकी मांग है कि ऐसी व्यावहारिक नीति बनाई जाए, जिसमें प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरतों और डॉक्टरों के करियर से जुड़ी चिंताओं के बीच संतुलन रहे।

सरकारी अस्पतालों में पीजी डॉक्टरों की अहम भूमिका

आरडीए ने कहा कि पीजी रेजिडेंट डॉक्टर सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे अस्पतालों के वार्डों, आपातकालीन सेवाओं और गहन चिकित्सा इकाइयों में चौबीसों घंटे मरीजों की देखभाल करते हैं। ऐसे डॉक्टरों को आकर्षित करना बेहतर चिकित्सा प्रशिक्षण और मरीजों को गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराने के लिए जरूरी है।

एसोसिएशन ने पीजी डॉक्टरों के स्टाइपेंड में बढ़ोतरी कर इसे राष्ट्रीय स्तर के अनुरूप करने की मांग भी उठाई है। उसका कहना है कि आर्थिक शर्तें बेहतर होने से हिमाचल के मेडिकल कॉलेज प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों के लिए अधिक आकर्षक बन सकते हैं।

बिना स्टाइपेंड काम कर रहे डॉक्टरों को भुगतान देने की मांग

आरडीए ने 'नो स्टाइपेंड, नो बॉन्ड' नीति के तहत काम कर रहे सैकड़ों पीजी डॉक्टरों का मुद्दा भी उठाया है। एसोसिएशन का दावा है कि ये डॉक्टर बिना किसी वेतन या स्टाइपेंड के काम कर रहे हैं। उसने मांग की है कि ऐसे डॉक्टरों को भुगतान किया जाए। एसोसिएशन के अनुसार, डॉक्टरों से तीन साल तक दिन-रात काम करने, मरीजों की जिम्मेदारी संभालने और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान देने की अपेक्षा के बावजूद उन्हें कोई आर्थिक भुगतान नहीं मिलना गंभीर चिंता का विषय है।

सरकार से डॉक्टरों के संगठनों के साथ बातचीत की अपील

एसोसिएशन ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों से रेजिडेंट डॉक्टर संगठनों के साथ बातचीत कर पीजी चिकित्सा शिक्षा से जुड़ी नीतियों में सुधार करने की मांग की है। उसका कहना है कि उचित स्टाइपेंड और व्यावहारिक सेवा बॉन्ड नीति से प्रदेश के मेडिकल संस्थानों को मजबूत करने, प्रतिभाशाली डॉक्टरों को आकर्षित करने और मरीजों की देखभाल बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा