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रंगमंच: मेरे अपने नाटक में दिखाया समाज की विसंगतियों का आईना

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रंगमंच: मेरे अपने नाटक में दिखाया समाज की विसंगतियों का आईना


मंडी, 04 जून (हि.स.)। मंडी के टाउन हॉल में उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, पटियाला तथा हिमाचल सांस्कृतिक शोध संस्थान एवं रंगमंडल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित नाट्य प्रस्तुति मेरे अपने का सफल मंचन किया गया। मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी पर आधारित इस नाटक का नाट्य रूपांतरण सीमा शर्मा द्वारा किया गया।

सुरेश शर्मा के मार्गदर्शन में ज्योति पांडे द्वारा निर्देशित यह प्रस्तुति आज के सामाजिक परिवेश में वृद्धावस्था, पारिवारिक संवेदनाओं तथा पीढ़ियों के बीच संबंधों को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। कहानी की मुख्य पात्र बूढ़ी काकी है, जो अपनी सारी जमीन-जायदाद अपने भतीजे के नाम कर देती है। इसके बाद वह घर की एक कोठरी में उपेक्षित जीवन बिताने को विवश हो जाती है। परिवार के लोग उसकी सुध तक नहीं लेते और वह भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकता के लिए भी तरसती रहती है। घर में बड़े-बड़े तीज-त्योहार और उत्सव होते हैं, किन्तु उसे उन सब से अलग रखा जाता है। नाटक यह दर्शाता है कि जब मनुष्य अपने अतीत और उससे जुड़े लोगों को भुला देता है, तो उसका वर्तमान भी खोखला हो जाता है।

परिवार का एक छोटा बालक चुन्नू ही बूढ़ी काकी के प्रति संवेदना दिखाता है और अपने हिस्से का भोजन उसे खिलाता है। जब उसका पेट नहीं भरता, तो वह जूठे पत्तलों में बचे भोजन को खाने के लिए विवश हो जाती है। यह दृश्य नाटक का सबसे मार्मिक और प्रभावशाली क्षण बनकर सामने आता है।

जब चुन्नू की मां को यह ज्ञात होता है कि बूढ़ी काकी ने जूठे पत्तलों से भोजन किया है, तो उसे अपनी भूल का गहरा पश्चाताप होता है। तब उसे एहसास होता है कि जिस पीढ़ी और अतीत को वे भूल चुके हैं, वही उनके वर्तमान की नींव है। इसी आत्मबोध के साथ परिवार पुनः बूढ़ी काकी को सम्मान और अपनापन प्रदान करता है।

नाटक का संदेश स्पष्ट है कि अतीत, परंपरा और बुजुर्गों का सम्मान किए बिना वर्तमान और भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकते। नाट्य कार्यशाला की इस प्रस्तुति ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। संगीत संचालन पूजा ने किया, जबकि प्रकाश व्यवस्था का दायित्व कश्मीर सिंह एवं व्योम ने संभाला।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा