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वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका सुनिश्चित करेगा भारत : प्रो. बंसल

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वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका सुनिश्चित करेगा भारत : प्रो. बंसल


धर्मशाला, 01 मई (हि.स.)। एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) के 100वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन डीवाई पाटिल यूनिवर्सिटी, पुणे में किया गया, जिसमें देशभर के लगभग 400 कुलपतियों ने भाग लिया। सम्मेलन का मुख्य विषय “पाठ्यक्रम एवं अनुसंधान में पारंपरिक ज्ञान और नई तकनीक का एकीकरण” रहा, जो स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा में भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया।

सम्मेलन के एक प्रमुख सत्र की अध्यक्षता हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति परी. एसपी बंसल ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को उभरती हुई आधुनिक तकनीकों के साथ प्रभावी ढंग से जोड़ना उच्च शिक्षा के पुनर्परिभाषण के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इस प्रकार का समन्वय न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में भारत की अग्रणी भूमिका सुनिश्चित करेगा।

प्रो. बंसल ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, बल्कि विज्ञान, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक विज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों में आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स तथा डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ पारंपरिक ज्ञान का एकीकरण शिक्षा को अधिक समग्र, नवाचार-उन्मुख और प्रभावी बना सकता है।

उन्होंने जानकारी दी कि एचपीसीयू ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं। विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय ज्ञान प्रणाली पर आधारित पुस्तकों का प्रकाशन किया जा रहा है, जिससे शैक्षणिक संसाधनों को सुदृढ़ किया जा सके। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापनों के माध्यम से सहयोगात्मक अनुसंधान और शैक्षणिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि एचपीसीयू में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर आधारित विशेष पाठ्यक्रम एवं शोध ढांचे विकसित किए जा रहे हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का उल्लेख करते हुए प्रो. बंसल ने इसे एक परिवर्तनकारी नीति बताया, जो पारंपरिक ज्ञान को मुख्यधारा की उच्च शिक्षा में शामिल करने के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करती है।

इस सत्र में अन्य विशिष्ट वक्ताओं ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान में एकीकृत करना समय की मांग है।

हिन्दुस्थान समाचार / सतेंद्र धलारिया