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कलाग्राम में सजी साहित्यकारों की महफिल, कविताओं एवं लोकनाटयों में काव्यात्मक अनुभूति पर चर्चा

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कलाग्राम में सजी साहित्यकारों की महफिल, कविताओं एवं लोकनाटयों में काव्यात्मक अनुभूति पर चर्चा


कलाग्राम में सजी साहित्यकारों की महफिल, कविताओं एवं लोकनाटयों में काव्यात्मक अनुभूति पर चर्चा


मंडी, 28 सितंबर (हि.स.)। मंडी के कला ग्राम के रूप में विकसित पंजैहठी में साहित्यकारों की महफिलम में पहाड़ी कविता के अस्तित्व एवं लोक नाट्यों और लोककलाओं में काव्यात्मक अनुभूति पर सार्थक चर्चा की गई। कालरू कायथ फाऊंडेशन के अंतर्गत पोयट्री कल्ब की पहली बैठक नैण तारा मात्री निलय परिसर में आयोजित की गई। इस बैठक में कल्ब की कार्यप्रणाली व भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की गई। फाउंडेशन के संस्थापक डा. राकेश कपूर ने बताया कि चर्चा में इस बात पर सहमति बनी कि इस प्रकार की पहल को आगे बढ़ाया जाए तथा किसी क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तर के लेखक की पुस्तक को सम्मिलित किया जाए। जिसे सदस्यों द्वारा पढ़ने के पश्चात उस पर सबके विचार साझा किए जाएं ।

बैठक के प्रथम सत्र में साहित्यकार -संस्कृति कर्मी मुरारी शर्मा ने लोकनाट्य एवम् लोककलाओं में काव्यात्मक अनुभूति विषय पर अपना प्रपत्र प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने कहा कि साहित्य हो या फिर वेद-पुराण एवं प्राचीन ग्रंथ यहां तक कि लोक कलाएं और लोक साहित्य सभी की रचना गद्य व पद्य के रूप में हुई है । कागज और कलम के प्रचलन से पूर्व भी साहित्य रचा गया है, जो मौखिक और काव्यात्मक पाद्यांश के रूप में रचा गया है जिसमें लोकगीत, लोक कहावतें, लोक आख्यान, धार्मिक एवं लोकगाथाएं यहां तक कि लोकनाट्कों के संवाद तक काव्यात्मक अनुभूति लिए होते हैं।

उन्होंने कहा कि पहाड़ का जीवन जीवटता के बावजूद एक लय में बंधा हुआ है। जो उसके कठिन जीवन का सहचर तो है ही उसकी कठोर जिंदगी में कहीं गहरे तक उतर जाती है। श्रम के गर्भ से उपजी लोक काव्य की धारा यहां के लोकगीतों और नाट्यों में भी प्रवाहित हो उठती है।

वहीं पर कवि आलोचक डा. विजय विशाल नें राष्ट्रीय परिपक्ष्य में मंडी जनपद की हिंदी कविता विषय पर अपना लेख प्रस्तुत किया तथा बताया कि मंडी जनपद की हिंदी कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी स्थानीयता में निहित व्यापकता है । यहां प्रकृति है तो उसके साथ मनुष्य भी है, लोक है तो आधुनिकता का तनाव भी , स्मृति है तो भविष्य की चिंता भी , निजि अनुभूति है तो उसके पीछे सामाजिक यथार्थ भी।दोनों प्रपत्रों पर उपस्थित सदस्यों द्वारा चर्चा की गई।

बैठक के दूसरे सत्र में चयनित चार लेखकों की सर्वश्रेष्ठ पहाड़ी कविताओं का पाठ किया गया। जगदीश कपूर ने अपनी पांच रचनाओं में कहा - चांदी सांही धारा पर छाई गई चानणी, दुड़ाकु बुड्डा घोड़ा, काम बौहत ता ज्युन थोड़ा, आपणे माहणू जाणे बाद तेसरी सुणवाई नि हुंदी, कोई लुफरू लगाई जांदा ता बड़ा खरा हुणा था और 12 मात्र की नाटी गा कर प्रस्तुत की भाणजुआ गंगे रामा चल नगरा जांणा .....।

वहीं पर डा. राकेश कपूर ने दो कविताएं प्रस्तुत की- गल्ल हल्की गरकी बी हुआई, गल्ल कद्धी हुंआहीं गला री गल और .. - नवें जमानेयां तू आसाओ नि चलेर, न ढबा न टक्का ना आने रा खेल, ना च्वान्नी ना ठान्नी ना माना री छेड़, रूपयेया तू बी आपणी हारवी न तरेर , नवें जमानेयां तू आसाओ नि चलेर ।

प्रकाश चंद्र धीमान ने पांच कविताए प्रस्तुत कीं । जिनमें- सुकेती रा पाणी, जे सरकारी से हमारी, हाय ओ मुइये कच्ची सड़के, बसंत - बहार और करसाण कविताएं प्रस्तुत की। कवि विनोद गुलेरिया ने तीन कविताएं - गुजरी गया बचपन मेरा बस यादा हे रही गई, पहाड़ी गज़ल- टप टप टिरे आहंजू हाखियां स्कोई गए तथा किहां बोलूं सौहरे जो जे सासू ते बी डरा दी , मिंजो बड्डी याद बापू तेरे घरा री प्रस्तुत की।

कविताओं पर टिप्पणियां करते हुए मुरारी शर्मा ने कहा कि पहाड़ी कविताओं की आलोचना नहीं हो रही है, जिससे उनका सही मुल्यांकन भी नही हो रहा है। अर्चना कपूर ने कहा कि प्रस्तुत कविताओं में अपने अपने जमाने को खुशी से प्रस्तुत किया है। लतेश कपूर ने उन्हे भावों की अभिव्यक्ति कहा । डा. विजय विशाल ने कहा कि मंडयाली कविताओं को जहां मनोरंजन कहा वहीं आधुनिक कविता भावनात्मक है।

उन्होंने प्रेम भारद्वाज की पहाड़ी कविताओं तथा विनोद कुमार भावुक की पहाड़ी में लिखि गजलों में परिवेश पर पकड़ की बात की । इस कार्यक्रम में सरिता हांडा तथा युवा कवि अनिल महंत भी उपस्थित थे । ट्रस्ट की ओर से अर्चना कपूर ने सभी उपस्थित सदस्यों का धन्यवाद किया और कहा कि मैं अकेले पुस्तकें तो बहुत पढ़ती रही हूं, परंतु अब इस मंच पर विचारों को साझा करने से ज्यादा आनंद का अनुभव हो रहा है। इस अवसर पर साहित्यकार उपन्यासकार मुरारी शर्मा ने अपनी चर्चित कृति देबकू एक प्रेमकथा की प्रति बुकक्लब को भेंट की।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा