21 साल की साक्षी बनी हिमाचल की सबसे युवा जिला परिषद सदस्य, न कोई राजनीतिक विरासत, न किसी पार्टी का सहारा
शिमला, 04 जून (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश के पंचायतीराज चुनावों में कांगड़ा जिले के फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र के रियाली जिला परिषद वार्ड से एक ऐसा नतीजा सामने आया है जिसने स्थानीय राजनीति के कई स्थापित समीकरणों को चुनौती दी है। 21 वर्ष 11 माह की साक्षी ने जिला परिषद सदस्य का चुनाव जीतकर प्रदेश की सबसे युवा जिला परिषद सदस्य बनने का गौरव हासिल किया है।
दिलचस्प बात यह है कि साक्षी किसी भी बड़े राजनीतिक दल से जुड़ी नहीं हैं। उन्होंने एक स्वतंत्र (आजाद) उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरकर कांग्रेस और भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को स्पष्ट अंतर से पीछे छोड़ दिया। उनकी जीत का अंतर करीब 1100 वोट रहा। चुनाव में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार दूसरे और भाजपा समर्थित उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे। जिला परिषद के एक वार्ड के चुनाव में लगभग 17 पंचायतों के मतदाता वोट डालकर अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। विधायक के चुनाव के बाद जिला परिषद सदस्य के चुनाव में भारी संख्या में मतदाता वोट डालते हैं।
रियाली जिला परिषद सीट महिला सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित थी। फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है और यहां कांग्रेस का विधायक भी है। राज्य में भी कांग्रेस की सरकार है। इसके बावजूद कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की चुनावी रणनीति इस सीट पर काम नहीं आई।
समाजसेवा के भरोसे मिली जीत
साक्षी कांगड़ा जिले के हटली गांव की निवासी हैं। उनका जन्म जून 2004 में हुआ था। स्नातक तक शिक्षा प्राप्त कर चुकीं साक्षी एक साधारण परिवार से आती हैं। उनके परिवार का कोई बड़ा राजनीतिक इतिहास नहीं रहा है।
उनके ससुर हंसराज क्षेत्र में समाजसेवी के रूप में जाने जाते हैं। स्थानीय लोगों के बीच उनकी सक्रियता और जनसेवा की छवि को इस जीत का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। साक्षी की सास करीब दो दशक पहले गांव की प्रधान रह चुकी हैं, लेकिन परिवार कभी सक्रिय दलगत राजनीति का हिस्सा नहीं रहा।
चुनाव परिणाम को कई स्थानीय लोग इस रूप में भी देख रहे हैं कि मतदाताओं ने राजनीतिक दलों के नाम और चुनावी मशीनरी की बजाय समाजसेवा की पहचान को प्राथमिकता दी।
शादीशुदा हैं साक्षी, एक बच्चे की मां
साक्षी की व्यक्तिगत कहानी भी उन्हें अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों से अलग बनाती है। वह शादीशुदा हैं और एक छोटे बच्चे की मां हैं। उनके पति परमजीत सिंह निजी कार्य करते हैं।
इतनी कम उम्र में जिला परिषद सदस्य बनने के बाद साक्षी की चर्चा पूरे क्षेत्र में हो रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि युवा नेतृत्व को मौका देने की सोच भी उनकी जीत के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण रही।
कांग्रेस और भाजपा की रणनीति क्यों नहीं चली?
इस चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अपने समर्थित उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। दोनों दलों के नेता प्रचार अभियान में भी सक्रिय रहे। इसके बावजूद मतदाताओं ने दलों के बजाय एक स्वतंत्र उम्मीदवार को चुना।फतेहपुर जैसे विधानसभा क्षेत्र में, जहां लंबे समय से कांग्रेस का प्रभाव रहा है, वहां एक स्वतंत्र उम्मीदवार की यह जीत विशेष महत्व रखती है।
जीत का श्रेय पति और ससुर को
साक्षी ने अपनी जीत का पूरा श्रेय अपने पति परमजीत सिंह और ससुर हंसराज को दिया है। उनका कहना है कि परिवार के सहयोग और क्षेत्र के लोगों के विश्वास के कारण ही यह सफलता संभव हो सकी।
उन्होंने कहा कि चुनाव जीतना उनके लिए सम्मान के साथ-साथ बड़ी जिम्मेदारी भी है और वह लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करेंगी।
साक्षी की जिला परिषद सदस्य के रूप में प्राथमिकताएं
साक्षी का कहना है कि उनके क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या पेयजल संकट है। कई गांवों में लोगों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा स्कूलों की दूरी और शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी बड़ी समस्या हैं।
उनके अनुसार उनकी प्राथमिकताओं में क्षेत्र में पेयजल समस्या के समाधान के लिए प्रयास, शिक्षा सुविधाओं को बेहतर बनाने की दिशा में काम, खराब सड़कों की स्थिति को सुधारने के लिए सरकार के समक्ष मामला उठाना, केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना, गरीब और जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए काम करना और क्षेत्र की मूलभूत सुविधाओं को मजबूत करना इत्यादि शामिल है।
साक्षी का कहना है कि सड़क, पानी और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों पर सबसे पहले ध्यान दिया जाएगा और जिला परिषद मंच पर इन मुद्दों को मजबूती से उठाया जाएगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

