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हिमाचल का राजकोषीय घाटा 12,611 करोड़ और राजस्व घाटा 6,804 करोड़ पहुंचा, कैग ने बढ़ते कर्ज पर जताई चिंता

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हिमाचल का राजकोषीय घाटा 12,611 करोड़ और राजस्व घाटा 6,804 करोड़ पहुंचा, कैग ने बढ़ते कर्ज पर जताई चिंता


शिमला, 03 सितंबर (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने सरकार के सामने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2024-25 में राज्य का राजस्व घाटा 6,804.61 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 12,611.05 करोड़ रुपये रहा। दोनों ही निर्धारित सीमा से अधिक हैं। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने गुरुवार को विधानसभा में कैग की रिपोर्ट रखी।

रिपोर्ट के अनुसार राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का करीब 86 प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन और ग्रेच्युटी पर खर्च हो गया। केवल वेतन और पेंशन पर ही करीब 70 प्रतिशत राजस्व खर्च हुआ। इससे सरकार के पास सड़क, भवन और दूसरी आधारभूत सुविधाओं सहित विकास कार्यों और पूंजीगत निवेश के लिए सीमित राशि बची।

कैग ने कहा है कि वर्ष 2024-25 में राज्य सरकार राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन कानून के तहत तय घाटे की सीमा के भीतर नहीं रह सकी। राजस्व घाटा राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 2.94 प्रतिशत रहा, जबकि राजकोषीय घाटा का 5.44 प्रतिशत दर्ज किया गया।

बढ़ते कर्ज और सीमित पूंजीगत निवेश पर सवाल

रिपोर्ट में हिमाचल के तेजी से बढ़ते कर्ज को लेकर भी चिंता जताई गई है। 31 मार्च 2025 तक राज्य की आंतरिक देनदारियां 67,448.38 करोड़ रुपये हो गईं। इसमें एक साल में 9.78 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसी अवधि में राज्य की कुल देनदारियां 1,04,410.57 करोड़ रुपये तक पहुंच गईं।

कैग ने कहा कि बढ़ते कर्ज के बीच पूंजीगत निवेश के लिए उपलब्ध राशि सीमित रहना राज्य की वित्तीय स्थिति के लिए चिंता का विषय है।

रिपोर्ट में बिजली सब्सिडी और कर्ज राहत उपायों पर बढ़ते खर्च को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके अनुसार राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों में से केवल करीब 14 प्रतिशत राशि बुनियादी ढांचे के विकास और पूंजीगत निवेश जैसे कामों के लिए उपलब्ध रही।

अर्थव्यवस्था बढ़ी, राष्ट्रीय जीडीपी में हिस्सेदारी घटी

रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 9.20 प्रतिशत रही। देश की जीडीपी में हिमाचल की हिस्सेदारी 0.70 प्रतिशत रही। कैग ने कहा है कि पिछले पांच वर्षों में राष्ट्रीय जीडीपी में राज्य की हिस्सेदारी में कमी आई है, जो चिंता का विषय है।

राज्य को अब भी केंद्र से मिलने वाले अनुदानों पर काफी निर्भर रहना पड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जीएसटी और केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी में 4.34 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि गैर-कर राजस्व में 22.40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बावजूद बिजली सब्सिडी और कर्ज राहत जैसे उपायों पर खर्च बढ़ने से वित्तीय दबाव बना हुआ है।

कुछ उपकर सरकारी खाते से बाहर रखे गए

कैग ने बजट प्रबंधन में भी कई कमियां बताई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मिल्क सेस, पर्यावरण उपकर और भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर जैसी राशि को सरकारी खाते से बाहर रखा गया। कैग के अनुसार यह संविधान के अनुच्छेद 266 के प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है।

स्थानीय निकायों, विभागीय उपक्रमों और स्वायत्त संस्थाओं की ओर से उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा करने में देरी पर भी कैग ने आपत्ति जताई है। इन प्रमाणपत्रों से यह पता चलता है कि जारी की गई राशि का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के लिए किया गया या नहीं।

मंजूर सीमा से 3,102 करोड़ अधिक खर्च

रिपोर्ट में वर्ष 2024-25 के बजट प्रबंधन में भी कई अनियमितताओं का उल्लेख है। विधानसभा से मंजूर सीमा से 3,102.88 करोड़ रुपये अधिक खर्च किया गया। यह अतिरिक्त खर्च सात अनुदानों और चार विनियोगों के तहत हुआ। इसमें अकेले वित्त विभाग के तहत 2,552.63 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च शामिल है।

कैग ने 16 मामलों में 438.66 करोड़ रुपये ऐसे खर्च किए जाने की बात कही है, जिनके लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं था। ये मामले नौ अनुदानों से जुड़े थे।

5,676 करोड़ की बचत सरेंडर नहीं हुई

बजट में राशि के इस्तेमाल और बची हुई राशि को वापस करने की प्रक्रिया पर भी कैग ने सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 32 अनुदानों और 11 विनियोगों में कुल 5,676.18 करोड़ रुपये की बचत हुई, लेकिन इस राशि को सरेंडर नहीं किया गया।

इसके अलावा 14 योजनाओं के लिए 673.11 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया था, लेकिन इन योजनाओं पर एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ।

दूसरी ओर, 13 मामलों में 1,575.44 करोड़ रुपये के अनुपूरक प्रावधान को कैग ने अनावश्यक बताया है।

कैग ने राज्य सरकार को बढ़ते कर्ज और सीमित पूंजीगत निवेश के बीच वित्तीय स्थिरता को लेकर सावधान किया है। रिपोर्ट में राज्य की दीर्घकालीन वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए राजस्व बढ़ाने, खर्च नियंत्रित करने और संरचनात्मक सुधार लागू करने की जरूरत बताई गई है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा