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पांच फीसदी से 99.5 प्रतिशत साक्षरता तक पहुंचा हिमाचल, देश में दूसरी सबसे ऊंची दर

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शिमला, 08 सितंबर (हि.स.)। आजादी के समय करीब पांच प्रतिशत साक्षरता दर वाले हिमाचल प्रदेश ने लगभग पूर्ण साक्षरता हासिल कर देश के सामने एक नई मिसाल पेश की है। प्रदेश की वर्तमान साक्षरता दर 99.5 प्रतिशत पहुंच गई है। इस उपलब्धि के साथ हिमाचल प्रदेश देश में गोवा के बाद दूसरे स्थान पर है।

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर मंगलवार को नई दिल्ली में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश को साक्षरता के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया। शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने प्रदेश की ओर से यह पुरस्कार प्राप्त किया। उन्हें कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया गया था।

इस मौके पर शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की यह उपलब्धि ऐतिहासिक है। उन्होंने कहा कि आजादी के समय हिमाचल देश के उन क्षेत्रों में शामिल था, जहां साक्षरता दर बेहद कम थी। उस समय देश की साक्षरता दर करीब 13 प्रतिशत थी, जबकि हिमाचल में यह लगभग पांच प्रतिशत थी। सीमित आर्थिक और भौगोलिक संसाधनों वाले पहाड़ी राज्य का पांच प्रतिशत से 99.5 प्रतिशत साक्षरता दर तक पहुंचना शिक्षा के क्षेत्र में कई दशकों से किए जा रहे प्रयासों का परिणाम है।

रोहित ठाकुर ने कहा कि हिमाचल में शिक्षा के विस्तार की मजबूत नींव प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार ने रखी थी। इसके बाद प्रदेश में अलग-अलग सरकारों ने भी शिक्षा को प्राथमिकता दी और लगातार इसमें निवेश किया। उन्होंने कहा कि 1960 और 1970 के दशक में सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद प्रदेश के बजट का करीब 18 से 20 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च किया जाता था। लंबे समय तक शिक्षा को प्राथमिकता देने और इस क्षेत्र में लगातार निवेश का परिणाम है कि हिमाचल आज देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि लगभग पूर्ण साक्षरता हासिल करने के बाद अब हिमाचल के सामने शिक्षा के क्षेत्र में अगली बड़ी चुनौती गुणवत्ता की है। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ शिक्षण संस्थानों की कार्यप्रणाली में सुधार की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप को न्यूनतम किया जाना चाहिए। शिक्षकों के तबादलों के लिए उचित नीति होनी चाहिए और उन्हें एक निश्चित कार्यकाल मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि शैक्षणिक सत्र के बीच शिक्षकों के तबादले नहीं होने चाहिए। शिक्षकों की नियमित नियुक्तियां की जानी चाहिए और नियुक्ति प्रक्रिया में किसी भी तरह की पिछली खिड़की से व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। शिक्षा मंत्री ने कहा कि मजबूत शिक्षा व्यवस्था के लिए शिक्षकों को स्थिर कार्य वातावरण देना जरूरी है।

रोहित ठाकुर ने सरकारी शिक्षण संस्थानों में घटती छात्र संख्या को भी बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि कम छात्र संख्या के कारण प्रदेश में करीब 1,500 स्कूलों को बंद, मर्ज या डाउनग्रेड करना पड़ा है। कई कॉलेजों में विद्यार्थियों की संख्या घटकर 40 से 50 तक रह गई है। ऐसी स्थिति में नए शिक्षण संस्थान खोलने का फैसला राजनीतिक आधार पर नहीं लिया जाना चाहिए। इसके लिए विद्यार्थियों की संख्या और क्षेत्र की वास्तविक जरूरत को आधार बनाया जाना चाहिए।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि पिछले 15 वर्षों में सरकारी स्कूलों से करीब चार लाख विद्यार्थी कम हुए हैं। यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती है। लगभग पूरी आबादी को साक्षर बनाने के बाद अब ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर हो और अभिभावकों का भरोसा इन संस्थानों में दोबारा मजबूत हो।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा