ग्रामीण-दूरदराज इलाकों में सीबीएसई स्कूलों पर चार हफ्ते में फैसला लें सरकार : उच्च न्यायालय
शिमला, 06 मार्च (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के ग्रामीण, दूरदराज और दुर्गम क्षेत्रों में भी सीबीएसई पाठ्यक्रम के तहत स्कूलों को मान्यता देने और वहां के बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने की मांग पर राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर विचार कर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि याचिकाकर्ता द्वारा सरकार को दिए गए प्रतिवेदन पर शिक्षा सचिव आवश्यक निर्णय लें।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बी.सी. नेगी की खंडपीठ ने मंडी जिला के चच्योट तहसील के गांव जरयाड की निवासी हेमलता द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए जारी किए।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि राज्य सरकार को निर्देश दिए जाएं कि वह हिमाचल प्रदेश के पिछड़े, कठिन, दुर्गम और आदिवासी क्षेत्रों सहित ग्रामीण इलाकों में भी सीबीएसई से जुड़े स्कूलों में 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराए। याचिका में कहा गया था कि यह व्यवस्था भारत सरकार के “राइट ऑफ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कम्पलसरी एजुकेशन एक्ट, 2009” और “राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020” के प्रावधानों के अनुसार लागू की जानी चाहिए।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि हाल ही में राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड से संबद्ध 118 स्कूलों को सीबीएसई पाठ्यक्रम के तहत शिक्षा देने की अनुमति दी है, लेकिन ये स्कूल मुख्य रूप से उन्हीं क्षेत्रों में खोले गए हैं जहां पहले से ही कॉन्वेंट और सीबीएसई से जुड़े निजी स्कूल मौजूद हैं। याचिकाकर्ता का कहना था कि इससे ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के बच्चों के साथ भेदभाव हो रहा है, क्योंकि उन्हें इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार शहरों, जिला मुख्यालयों और शहरी क्षेत्रों में ही सीबीएसई से जुड़े नए स्कूल खोल रही है, जबकि ग्रामीण और कठिन इलाकों में एक भी स्कूल इस योजना के तहत नहीं लिया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार इस स्थिति को देखते हुए सरकार को चाहिए कि नए सीबीएसई स्कूल पिछड़े, दुर्गम और आदिवासी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी खोले जाएं ताकि वहां के बच्चों को भी समान शिक्षा के अवसर मिल सकें।
याचिका में यह भी कहा गया कि इन सीबीएसई से जुड़े स्कूलों में दाखिले के लिए सरकार पूरे राज्य में प्रवेश परीक्षा और स्क्रीनिंग टेस्ट आयोजित करवा रही है। याचिकाकर्ता के अनुसार यह प्रक्रिया “राइट ऑफ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कम्पलसरी एजुकेशन एक्ट, 2009” और “राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020” की भावना के विपरीत है, क्योंकि इन कानूनों के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को बिना किसी भेदभाव के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है।
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा सौंपे गए प्रतिवेदन पर चार सप्ताह के भीतर विचार कर आवश्यक निर्णय लिया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर सरकार कानून और नीति के प्रावधानों के अनुसार उचित कदम उठाए।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

