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हिमाचल प्रदेश में पिघल रहे ग्लेशियर, जलविद्युत उत्पादन पर पड़ेगा असर

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हिमाचल प्रदेश में पिघल रहे ग्लेशियर, जलविद्युत उत्पादन पर पड़ेगा असर


शिमला, 27 जुलाई (हि.स.)। हिमाचल प्रदेश की नदियां और जलविद्युत परियोजनाएं जिन ग्लेशियरों पर टिकी हैं, वे अब तेजी से पिघल रहे हैं। यही वजह है कि प्रदेश के जलविद्युत क्षेत्र को लेकर नई चिंता सामने आई है। एक विस्तृत अध्ययन में कहा गया है कि सतलुज बेसिन के लगभग सभी ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहे हैं और बर्फ का दायरा हर साल कम होता जा रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में नदियों में पानी का प्रवाह प्रभावित होगा। इससे बिजली उत्पादन, जल सुरक्षा और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। यह अध्ययन हिमाचल प्रदेश काउंसिल फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड एनवायरमेंट (हिमकोस्टे) के तहत राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र ने सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड (एसजेवीएनएल) के लिए तैयार किया है।

20 साल में 97 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा घटा ग्लेशियरों का दायरा, हर हिस्सा प्रभावित

अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 में सतलुज बेसिन में ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल 1,481.75 वर्ग किलोमीटर था, जो 2020 तक घटकर 1,384.16 वर्ग किलोमीटर रह गया। यानी दो दशक में 97 वर्ग किलोमीटर से अधिक ग्लेशियर खत्म हो चुके हैं। स्पीति, बस्पा, अपर सतलुज और लोअर सतलुज सभी क्षेत्रों में ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 80 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर हर साल 10 मीटर से कम की रफ्तार से पीछे खिसक रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ते तापमान और बर्फबारी के बदलते स्वरूप ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया है। रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि कुछ इलाकों में ग्लेशियरों की संख्या बढ़ती दिख रही है, लेकिन इसका मतलब नए ग्लेशियर बनना नहीं है। बड़े ग्लेशियर लगातार पिघलकर छोटे-छोटे हिस्सों में टूट रहे हैं। इसी कारण लोअर सतलुज में ग्लेशियरों की संख्या 1,694 से बढ़कर 1,709 और स्पीति में 696 से बढ़कर 699 दिखाई दे रही है। बस्पा में दो दशक से ग्लेशियरों की संख्या 99 बनी हुई है, फिर भी वहां ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं। अध्ययन में नाराडू ग्लेशियर का भी उल्लेख किया गया है, जो लगातार पतला होता जा रहा है।

ग्लेशियर घटे तो नदियों का मिजाज भी बदलेगा, बिजली उत्पादन पर पड़ेगा असर

रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल की अधिकांश जलविद्युत परियोजनाएं ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों पर निर्भर हैं। ग्लेशियर लगातार सिकुड़ने से पहले कुछ समय तक नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन बाद में जल प्रवाह घटने का खतरा रहेगा। इसके साथ ही नदियों में गाद की मात्रा बढ़ेगी, जिससे जलविद्युत परियोजनाओं की टरबाइनों का घिसाव तेज होगा और रखरखाव का खर्च बढ़ेगा। कम पानी वाले मौसम में बिजली उत्पादन भी घट सकता है। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि सतलुज बेसिन का कोई भी हिस्सा अब जलवायु परिवर्तन के असर से अछूता नहीं है। इसी कारण ग्लेशियरों और बर्फ की लगातार निगरानी, जल प्रवाह का सटीक पूर्वानुमान और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप नई योजनाएं तैयार करने की जरूरत बताई गई है।

पूरी क्षमता का आधा ही उपयोग कर पा रहा हिमाचल, अब जलवायु परिवर्तन भी बड़ी चुनौती

हिमाचल प्रदेश लंबे समय से देश की 'पावर स्टेट' बनने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन अभी तक अपनी पूरी जलविद्युत क्षमता का उपयोग नहीं कर पाया है। प्रदेश में जलविद्युत उत्पादन की कुल संभावित क्षमता 23,947.25 मेगावाट आंकी गई है, जबकि अब तक केवल 12,588.63 मेगावाट क्षमता ही विकसित हो सकी है। यानी कुल क्षमता का करीब 52.6 प्रतिशत ही उपयोग हो रहा है। ऊर्जा विभाग के अनुसार प्रदेश में 189 जलविद्युत परियोजनाएं चालू हैं, जबकि 54 परियोजनाएं निर्माणाधीन या विभिन्न चरणों में अटकी हुई हैं।

इसके अलावा 530 परियोजनाएं, जिनकी कुल क्षमता 7,623.61 मेगावाट है, अभी मंजूरी, आवंटन या अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझी हुई हैं। चिनाब और सतलुज बेसिन में सबसे अधिक जलविद्युत क्षमता मौजूद है। किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा, कुल्लू और मंडी इस क्षेत्र के प्रमुख जिले हैं। नाथपा-झाकड़ी, कोल डैम, पार्वती, कड़छम-वांगतू और व्यास जैसी परियोजनाओं ने हिमाचल को ऊर्जा क्षेत्र में अलग पहचान दिलाई है। निजी क्षेत्र ने 40 परियोजनाओं के माध्यम से 2,890.51 मेगावाट क्षमता विकसित की है, जबकि केंद्रीय और संयुक्त उपक्रमों ने 13 परियोजनाओं से 8,311.73 मेगावाट क्षमता स्थापित की है। पर्यावरण और सामाजिक कारणों से 11 परियोजनाओं की 815.40 मेगावाट क्षमता को छोड़ने का भी फैसला लिया गया है।

ऊर्जा विभाग के निदेशक राकेश कुमार प्रजापति का कहना है कि हिमाचल के पास लगभग 24 हजार मेगावाट जलविद्युत क्षमता है, जो प्रदेश के आर्थिक भविष्य की सबसे बड़ी ताकत है। उनका कहना है कि पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय लोगों के हितों का ध्यान रखते हुए लंबित परियोजनाओं को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा