home page

सायर पर्व पर धार्मिक पौधों की एथ्नोबॉटैनिकल विरासत समझने निकले विद्यार्थी

 | 
सायर पर्व पर धार्मिक पौधों की एथ्नोबॉटैनिकल विरासत समझने निकले विद्यार्थी


मंडी, 16 सितंबर (हि.स.)। सायर पर्व मंडी की समृद्ध लोक एवं जैव-सांस्कृतिक विरासत को समझने के उद्देश्य से वल्लभ राजकीय महाविद्यालय मंडी के एथ्नोबॉटनी विषय के 25 विद्यार्थियों ने लगभग 50 स्थानीय अखरोट एवं धार्मिक पौधों के विक्रेताओं से संवाद किया। उनसे पारंपरिक पादप ज्ञान, धार्मिक उपयोग, उपलब्धता और आजीविका से जुड़े पहलुओं का दस्तावेजीकरण किया।

विद्यार्थियों के अनुसार सैर में पुठकंडा, धान, मक्की, डरेड़, तिल, खट्टे फल, कचालू, अखरोट तथा कुरी जैसे पौधों एवं कृषि उत्पादों का पारंपरिक रूप से धार्मिक महत्व है। विक्रेताओं ने बताया कि धार्मिक पौधों की बिक्री से कुछ विक्रेताओं को सैर के दौरान लगभग 7,000 से 10,000 रुपए तक की आय हो जाती है। इससे पर्व की सांस्कृतिक भूमिका के साथ-साथ स्थानीय मौसमी आजीविका से इसके संबंध का भी पता चलता है। सर्वेक्षण के दौरान डरेड़ और कोथा घास की प्राकृतिक उपलब्धता में कमी की जानकारी सामने आई।

कुछ विक्रेताओं ने बताया कि जंगली क्षेत्रों में उपलब्धता घटने के कारण उन्होंने इन पौधों की खेती शुरू कर दी है। वहीं, इस वर्ष कुछ विक्रेताओं द्वारा सिलोसिया और एनागालिस के पुष्प पहली बार सैर के अवसर पर बिक्री के लिए लाए गए। अखरोट विक्रेताओं ने इस वर्ष बिक्री में कमी की बात कही। उनके अनुसार अखरोट की अधिक पैदावार और कश्मीर से आए अधिक विक्रेताओं के कारण बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।

डॉ. तारा देवी सेन, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान विभाग मंडी ने कहा कि सैर केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को समझने का जीवंत माध्यम है। विद्यार्थियों को स्थानीय समुदाय से सीधे संवाद के माध्यम से पौधों के स्थानीय नाम, धार्मिक उपयोग, संग्रहण, उपलब्धता, खेती और बाजार से जुड़े पहलुओं को समझने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि परंपरा से जुड़े पौधों का संरक्षण केवल जैव विविधता का संरक्षण नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति और पारंपरिक ज्ञान को सुरक्षित रखने का भी माध्यम है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / मुरारी शर्मा