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जलवायु परिवर्तन से फसलों में बढ़ते रोगों की चुनौती, शिमला में वैज्ञानिकों ने खोजे समाधान

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जलवायु परिवर्तन से फसलों में बढ़ते रोगों की चुनौती, शिमला में वैज्ञानिकों ने खोजे समाधान


शिमला, 23 अक्टूबर (हि.स.)। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों में उभर रहे नए रोग कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहे हैं। इनसे निपटने के लिए रोगों की समय पर पहचान, टिकाऊ फसल संरक्षण तकनीकों और जलवायु के अनुकूल खेती को बढ़ावा देना जरूरी है। शिमला स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के वैज्ञानिकों ने इन चुनौतियों और संभावित समाधानों पर चर्चा की औऱ समाधान खोजे। शुक्रवार को संगोष्ठी संपन्न हुई।

गेहूं से लेकर राजमा तक फसलों के रोगों पर चर्चा

संगोष्ठी के दूसरे दिन पहले तकनीकी सत्र की अध्यक्षता आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर के पूर्व संयुक्त निदेशक डॉ. जे. कुमार ने की। डॉ. धर्मेश गुप्ता सह-अध्यक्ष और डॉ. आरती शुक्ला प्रतिवेदक रहीं। इस सत्र में चार आमंत्रित व्याख्यान और छह मौखिक शोध प्रस्तुतियां दी गईं।

वैज्ञानिकों ने भारत में गेहूं के रोगों की मौजूदा स्थिति, उनसे जुड़ी नई चुनौतियों और प्रबंधन के तरीकों पर चर्चा की। हिमालयी क्षेत्र में राजमा की स्थानीय किस्म केआरसी-5 से वैश्विक स्तर पर पहचान पाने वाली को-18 किस्म तक की यात्रा पर भी जानकारी साझा की गई। इसके अलावा अंडों के संदूषण से जुड़े सूक्ष्मजीवों की पहचान और उनके प्रबंधन तथा जलवायु के अनुकूल कृषि एवं वानिकी में माइकोराइजा सहजीविता की उपयोगिता पर विचरण रखे गए।

‘जलवायु अनुकूलन, खाद्य सुरक्षा एवं सतत कृषि के लिए अगली पीढ़ी की पादप स्वास्थ्य रणनीतियाँ’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, उद्योग प्रतिनिधियों और युवा शोधार्थियों ने अपने शोध निष्कर्ष साझा किए। वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों में रोगों के बदलते स्वरूप, रोगजनकों के व्यवहार और उनके प्रबंधन के उपायों पर भी शोध प्रस्तुतियां दीं।

संगोष्ठी में ‘एक स्वास्थ्य एवं सतत पादप स्वास्थ्य नवाचारों के लिए किसान-उद्योग-शोधकर्ता-नीति समन्वय’ विषय पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इसमें कीटनाशक, फसल संरक्षण और कृषि आदान से जुड़ी कंपनियों के प्रतिनिधियों ने नई तकनीकों और उत्पादों की जानकारी दी। सत्र में किसानों, वैज्ञानिकों, उद्योगों और नीति निर्माताओं के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया। इसकी अध्यक्षता डॉ. के. डी. शर्मा ने की। डॉ. संजीव शर्मा सह-अध्यक्ष और डॉ. जगमोहन सिंह ढिल्लों प्रतिवेदक रहे।

समापन समारोह में वैज्ञानिक अनुसंधान और शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए पुरस्कार दिए गए। डॉ. ऋतु बाला को फेलो पुरस्कार, डॉ. प्रियंका नेगी को सर्वश्रेष्ठ पीएच.डी. शोध प्रबंध पुरस्कार और शैलजा गुप्ता को एम.एससी. पुरस्कार प्रदान किया गया। आईपीएस एन. जे. नरसिम्हा पुरस्कार अर्शिया पराशर और सुगाशा गौतम को मिला, जबकि एपीएस-आईपीएस यात्रा अनुदान दिनेश कुमार और दीपिका रावत को दिया गया।

पांच मौखिक प्रस्तुति सत्रों में उत्कृष्ट शोध के लिए अंबिका रौतेला, शालिनी वर्मा, डॉ. नीना गुप्ता, डॉ. जगमोहन सिंह, डॉ. हेमंत कंडिले, डॉ. प्रणीत चहल, डॉ. विकास मंगल, डॉ. हरप्रीत सिंह, डॉ. के. क्रांति, डॉ. सुभाष, डॉ. नित्या, डॉ. कैलाश चंद्र नागा, डॉ. सालेज सूद, डॉ. पी. लोकेश बाबू और डॉ. कार्तिक आर. को सम्मानित किया गया।

वैज्ञानिक पोस्टर प्रस्तुतियों की पांच श्रेणियों में भी पुरस्कार दिए गए। इनमें अमन चौहान, सिमरन कौर, पूजा चौहान, शैलजा गुप्ता, गरिमा वर्मा, नेहा शर्मा, सुखजीत कौर, प्रकृति, अंशिका पठानिया, गुरलीन कौर, डॉ. अंबिका रौतेला, अद्रिजा बरुआ, प्रकृति झिल्टा, नवीन, अक्षी अत्री, तरुणप्रीत कौर और शरद शेरॉफ शामिल रहे। प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किए गए।

संगोष्ठी के समापन पर वैज्ञानिकों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के बीच फसलों को रोगों से बचाने और खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए उन्नत रोग निदान तकनीकों, जलवायु के अनुकूल प्रबंधन और संस्थानों तथा उद्योगों के सहयोग को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने शोध के निष्कर्षों को किसानों के लिए व्यावहारिक समाधान में बदलने पर भी जोर दिया।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा