विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से समझौता स्वीकार नहीं, राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक पर एबीवीपी ने उठाए सवाल
शिमला, 05 सितंबर (हि.स.)। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) हिमाचल प्रदेश ने हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से पारित हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 का विरोध किया है। एबीवीपी ने आरोप लगाया है कि सरकार पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर रोक के नाम पर विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वायत्तता को कमजोर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
एबीवीपी हिमाचल प्रदेश की प्रदेश महामंत्री नैंसी अटल ने शनिवार को कहा कि विश्वविद्यालय सरकारी विभाग नहीं हैं। इनकी अपनी शैक्षणिक जरूरतें, शोध कार्य और कार्यप्रणाली होती है। ऐसे संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति केवल लिखित परीक्षा के आधार पर करना उचित नहीं है। शिक्षक चयन में शैक्षणिक रिकॉर्ड, शोध, प्रकाशन, विषयगत ज्ञान और अनुभव जैसे पहलुओं को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नियुक्ति व्यवस्था में विषय विशेषज्ञों वाली चयन समितियों का प्रावधान है। ऐसे में सामान्य भर्ती परीक्षा की व्यवस्था को विश्वविद्यालयों की अकादमिक चयन प्रक्रिया पर लागू करना चिंता का विषय है।
एबीवीपी के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, सरदार पटेल विश्वविद्यालय तथा कृषि एवं बागवानी विश्वविद्यालयों में शिक्षक भर्ती के लिए 80 प्रतिशत अंक अकादमिक योग्यता और 20 प्रतिशत अंक साक्षात्कार के आधार पर निर्धारित हैं। संगठन का कहना है कि आवेदन ऑनलाइन लिए जाते हैं और अकादमिक अंकों की प्रक्रिया भी पारदर्शी है। ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि पारदर्शिता के नाम पर पूरी व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता क्यों महसूस हुई।
नैंसी अटल ने कहा कि सरकार को ओडिशा और पंजाब में उच्च शिक्षा से जुड़ी नियुक्ति प्रक्रियाओं के अनुभवों से भी सीखना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामान्य परीक्षा आधारित व्यवस्था को लेकर वहां कानूनी और व्यावहारिक सवाल उठ चुके हैं।
एबीवीपी ने सरकार से पूछा है कि उसे ऐसी सलाह कौन दे रहा है और क्या विधेयक तैयार करने से पहले यूजीसी के नियमों तथा विश्वविद्यालयों की मौजूदा भर्ती व्यवस्था का अध्ययन किया गया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा

