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हिसार : मूंग-उड़द व अरहर की फसल पर बढ़ा रोग व कीटों का खतरा, अलर्ट हुए विशेषज्ञ

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जलभराव से बचाव, समय पर निराई-गुड़ाई और अनुशंसित दवाओं से बचाव संभावित

बरसात व नमी वाले मौसम में बढ़ जाती है बीमारियां फैलने की संभावना

हिसार, 03 अगस्त (राजेश्वर बैनीवाल)। वर्तमान में चल रहे बरसात व नमी वाले

मौसम में मूंग-उड़द व अरहर की फसल पर रोग व कीटों का खतरा बढ़ गया है। किसानों को चेताया

गया है कि यदि उन्होंने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो फसलों को बीमारियों से नुकसान

पहुंच सकता है।

मौसम को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने सचेत किया है कि मूंग की फसल में सफेद

मक्खी, हरा तेला, चूरड़ा और अन्य रस चूसने वाले कीट सक्रिय हो सकते हैं। इसके अलावा

सफेद मक्खी के कारण पीला मोजेक रोग फैलने की आशंका भी अधिक रहती है। ऐसे में किसानों

को सलाह दी गई है कि रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट करें तथा सफेद मक्खी के

नियंत्रण के लिए अनुशंसित दवा का समय पर छिड़काव करें और यदि जरूरत पड़े तो 12 से

15 दिन बाद दोबारा छिड़काव करें ताकि बीमारियों का रोकथाम हो सके।

विभिन्न क्षेत्रों से मिल रही सूचनाओं के आधार पर कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी

दी है कि लगातार बारिश और खेत में पानी भरने से अरहर की फसल में फाइटोफ्थोरा रॉट रोग

तेजी से फैल सकता है। इस रोग से पौधों की जड़ें गल जाती हैं और पूरी फसल कुछ ही दिनों

में सूख सकती है। ऐसे में किसानों को चाहिए कि अपने खेत से जल निकासी की समुचित व्यवस्था

करें ताकि पानी खड़ा न हो सके।

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के दलहन अनुभाग के वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह

दी है कि वे इस समय खरीफ दलहनी फसलों के प्रति विशेष सतर्कता बरतें। विशेषज्ञों के

अनुसार वर्तमान मौसम में मूंग, उड़द और अरहर की फसलों पर विभिन्न कीटों और रोगों का

प्रकोप बढ़ने की संभावना है। ऐसे में समय रहते उचित प्रबंधन बहुत जरूरी है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार दलहनी फसलों में पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 20

से 25 दिन बाद तथा दूसरी 40 से 45 दिन बाद करनी चाहिए। इन फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता

नहीं होती, इसलिए खेत में पर्याप्त नमी होने पर सिंचाई न करें और वर्षा का पानी खेत

में जमा न होने दें।

सही पहचान व समय पर उपचार से होगा नुकसान कम : कुलपति

हिसार स्थित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने किसानों

को सलाह दी है कि वे फसल में कीट एवं रोगों की नियमित निगरानी करें। किसी भी समस्या

की सही पहचान कर केवल अनुशंसित कीटनाशकों का निर्धारित मात्रा में ही उपयोग करें। समय

पर खरपतवार नियंत्रण, जल निकासी और वैज्ञानिक सलाह का पालन करने से दलहनी फसलों की

बेहतर पैदावार सुनिश्चित की जा सकती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक

लगातार निगरानी करके फसलों को बीमारियों से बचाने का प्रयास करते रहते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर