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हिसार : सुगंध, स्वाद व औषधीय गुणों के कारण भारतीय मसालों की मांग पूरे विश्व में : प्रो. बीआर कम्बोज

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हिसार : सुगंध, स्वाद व औषधीय गुणों के कारण भारतीय मसालों की मांग पूरे विश्व में : प्रो. बीआर कम्बोज


हकृवि में डीएएसडी (कालीकट) के सहयोग से ‘मसालों

के उत्पादन एवं प्रसंस्करण में उभरती प्रवृतियां’ विषय पर कार्यशाला आयोजित

राज्य स्तरीय कार्यशाला में बागवानी विभाग के

अधिकारी, विस्तार विशेषज्ञ और किसानों ने लिया भाग

हिसार, 20 मार्च (हि.स.)। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय

में सब्जी विज्ञान विभाग द्वारा ‘मसालों के उत्पादन एवं प्रसंस्करण में उभरती प्रवृतियां’ विषय पर दो दिवसीय

राज्य स्तरीय कार्यशाला आयोजित की गई। सुपारी एवं मसाला विकास निदेशालय कालीकट (केरल)

के सहयोग से आयोजित कार्यशाला में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज मुख्य

अतिथि रहे।

कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने शुक्रवार काे अपने संबोधन में

कहा कि हमारे देश की जलवायु, भौगोलिक विविधता और कृषि परंपराएं मसालों के उत्पादन के

लिए अत्यंत अनुकूल हैं। यही कारण है कि भारत आज विश्व में मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक

देश है। यहां लगभग 60 से अधिक प्रकार के मसाले जैसे हल्दी, मिर्च, जीरा, धनिया, इलायची

और काली मिर्च का उत्पादन किया जाता है। भारत न केवल उत्पादन में अग्रणी है, बल्कि

मसालों के उपभोग और निर्यात में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारतीय मसालों की सुगंध,

स्वाद और औषधीय गुणों के कारण इनकी मांग पूरे विश्व में बनी हुई है। आज भारत के मसाले

सैकड़ों देशों में निर्यात किए जाते हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती

है।

कुलपति ने बताया कि यदि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर

की बात करें, तो मसालों का वैश्विक बाजार तेजी से बढ़ रहा है। बदलती जीवनशैली, स्वास्थ्य

के प्रति बढ़ती जागरूकता और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों की लोकप्रियता के कारण मसालों की

मांग निरंतर बढ़ रही है। इस क्षेत्र में भारत की स्थिति अत्यंत मजबूत है। हालांकि हमें

यह भी समझना होगा कि अभी भी हमारे अधिकांश मसाले कच्चे रूप में निर्यात होते हैं। यदि

हम प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और गुणवत्ता सुधार पर अधिक ध्यान दें, तो हम वैश्विक बाजार

में और भी अधिक लाभ कमा सकते हैं और अपनी स्थिति को और सशक्त बना सकते हैं। मसाले केवल

हमारे भोजन का स्वाद ही नहीं बढ़ाते, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और आर्थिक विकास

का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हमें इस क्षेत्र में नवाचार और गुणवत्ता सुधार के माध्यम

से भारत को और ऊंचाइयों तक पहुंचाना होगा।

विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. रमेश कुमार यादव ने

बताया कि यह कार्यशाला कृषि विज्ञान केन्द्रों के लिए बहुत उपयोगी है। किसानों को परम्परागत

फसलों के स्थान पर दलहनी, तिलहनी एवं मसालों की फसलों को प्राथमिकता देनी चाहिए। किसान

कृषि के साथ-साथ पशुपालन, बागवानी तथा सब्जी उत्पादन का कार्य शुरू करके अपनी आमदनी

में कई गुणा बढ़ोतरी कर सकते हैं। डॉ. एसके तेहलान ने सभी का स्वागत करते हुए कार्यशाला

के बारे में विस्तार से जानकारी दी। डॉ. सुरेन्द्र कुमार धनखड़ ने धन्यवाद प्रस्ताव

पारित किया। कार्यशाला में विस्तार विशेषज्ञ, बागवानी अधिकारी व किसानों ने भाग लिया।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर