हिसार पहुंचने पर ‘गोल्डन बॉय’ अंकुश पंघाल का स्वागत, बहन बनी सारथी
25 किलोमीटर तक गूंजा जीत का जश्न
कॉमनवेल्थ गेम्स के स्वर्ण विजेता पर हुई पुष्पवर्षा,
मां के हाथ के चूरमे से मनाया जीत का जश्न
हिसार, 06 अगस्त (हि.स.)। स्कॉटलैंड के ग्लासगो
में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ गेम्स) में 80 किलोग्राम भार वर्ग की बॉक्सिंग
स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाने वाले हिसार के गांव भेरिया निवासी
अंकुश पंघाल का गुरुवार को अपने गृह जिले में अभूतपूर्व स्वागत हुआ। शहर से लेकर गांव
तक पूरे मार्ग पर खेल प्रेमियों, ग्रामीणों और समर्थकों ने ढोल-नगाड़ों, फूल-मालाओं
और जयघोष के साथ अपने स्वर्णिम सितारे का अभिनंदन किया।
इस भव्य स्वागत की सबसे खास बात यह रही जब स्वर्ण
पदक विजेता अंकुश पंघाल विशेष रूप से सजी ओपन जीप में सवार होकर विजय यात्रा का हिस्सा
बने और जीप की कमान उनकी बहन अंशुल पंघाल ने संभाली। बहन ने कहा कि अपने भाई की इस
उपलब्धि पर उन्हें अपार गर्व है। यह सम्मान केवल उनके परिवार का नहीं, बल्कि
पूरे देश और हरियाणा का है।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दोपहर करीब एक
बजे एचएयू के गेट नंबर-4 से विजय जुलूस का शुभारंभ हुआ। लगभग 25 किलोमीटर लंबी यह यात्रा
आजाद नगर सहित विभिन्न मार्गों से होते हुए गांव भेरिया पहुंची। रास्ते में पांच प्रमुख
स्थानों पर लोगों ने फूल बरसाकर, मालाएं पहनाकर और भारत माता के जयकारों के बीच अपने
चैंपियन का स्वागत किया।
गांव भेरिया पहुंचने पर विजय जुलूस अंकुश के पिता
सुरेश पंघाल के प्रसिद्ध आरएस ढाबा पहुंचा, जहां सैकड़ों लोगों ने उनका गर्मजोशी से
अभिनंदन किया। इसके बाद गांव में आयोजित भव्य सम्मान समारोह में खेल जगत की हस्तियों,
सामाजिक संगठनों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भाग लेकर स्वर्ण विजेता को सम्मानित
किया।
अंकुश के ताऊ रमेश पंघाल ने कहा कि बच्चों को
खेलों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने
बच्चों की खेल प्रतिभा को पहचानें और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दें। उन्होंने कहा कि
जब खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर पदक जीतते हैं तो पूरा देश गर्व महसूस करता है। उन्होंने
बताया कि पंघाल परिवार में खेलों की समृद्ध परंपरा रही है। परिवार के छह सदस्य खेलों
से जुड़े हैं। बड़ी बेटी राइफल शूटिंग में अपना करियर बना रही है, जबकि अन्य सदस्य
बॉक्सिंग में सक्रिय हैं। अंकुश ने भी बचपन में कबड्डी से खेल जीवन की शुरुआत की थी।
उनके पिता सुरेश पंघाल राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी रह चुके हैं। बाद में गांव
में बॉक्सिंग का बेहतर माहौल मिलने पर अंकुश ने मुक्केबाजी को अपना लक्ष्य बनाया और
आज विश्व मंच पर स्वर्णिम सफलता हासिल की।
पिता सुरेश पंघाल ने भावुक होते हुए कहा कि लंबे
समय बाद घर लौट रहे बेटे के लिए सबसे पहले उसकी पसंद का खाना तैयार किया गया है। उन्होंने
बताया कि अंकुश को मालपुआ भी बेहद पसंद है, लेकिन बॉक्सिंग की कड़ी डाइट के कारण वह
अपनी पसंदीदा चीजें कम ही खा पाता है। अब स्वर्ण पदक जीतकर लौटने के बाद वह सबसे पहले
अपनी मां मुकेश के हाथ का बना देसी घी वाला चूरमा खाकर जीत का जश्न मनाएगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर

