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नई सीरीज में वाहन का पुराना नंबर रखने पर नही लगेगी फीस

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चंडीगढ़, 23 मई (हि.स.)। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रदेश के लाखों वाहन मालिकों को राहत देते हुए कहा है कि पुराने पंजीकरण वाले नंबरों को नई सीरीज में बदलवाने के लिए किसी प्रकार की फीस नहीं लगेगी। वाहन मालिकों के पास भले ही वीआईपी तथा पुरानी सीरीज में अपना पसंदीदा नंबर क्यो न हो। हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार द्वारा वर्ष 2019 में जारी की अधिसूचना को भी रद्द कर दिया है।

जस्टिस जगमोहन बंसल ने यह फैसला देते हुए हरियाणा सरकार के 8 नवंबर, 2019 के उस ज्ञापन को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अगर वाहन मालिक नई एचआर सीरीज में अपना पसंदीदा नंबर रखना चाहते हैं तो उन्हें निर्धारित फीस देनी होगी।

हरियाणा में पहले कई वाहनों के नंबर एचआर-सीरीज के बजाय दूसरी पुरानी सीरीज में जारी किए गए थे। बाद में सरकार ने नई एचआर सीरीज लागू करते हुए पुराने नंबर बदलने की प्रक्रिया शुरू की। 28 मई 2019 को राज्य सरकार ने स्पष्ट किया था कि पुराने नंबरों को नई सीरीज में बिना किसी शुल्क के बदला जा सकता है।

इसके कुछ समय बाद 8 नवंबर 2019 को नई सूचना जारी करते हुए कहा गया कि यदि कोई वाहन मालिक अपना पुराना पसंदीदा या वीआईपी नंबर नई सीरीज में रखना चाहता है तो उसे फीस देनी पड़ेगी। इसी फैसले को कई वाहन मालिकों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार पुराने नंबरों को एचआर सीरीज में बदल सकती है, लेकिन इसके लिए कोई शुल्क नहीं ले सकती। कोर्ट ने साफ किया कि एक बार पहले से आवंटित पसंदीदा नंबर के लिए दोबारा फीस लेना कानूनन सही नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत पंजीकरण नंबरों की वैधता और नियम तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकार केवल ज्ञापन जारी करके अतिरिक्त शुल्क नहीं लगा सकती।

इस फैसले के बाद अब पुराने गैर-एचआर नंबर वाले वाहन मालिक बिना अतिरिक्त भुगतान किए अपनी गाडिय़ों के नंबर नई एचआर सीरीज में बदलवा सकेंगे। उन लोगों को राहत मिलेगी जिन्होंने पहले ही वीआईपी या पसंदीदा नंबर के लिए रकम जमा कराई थी।

हरियाणा सरकार ने कोर्ट में कहा था कि पुरानी सीरीज समाप्त हो चुकी हैं और वाहन मालिकों को नई एचआर-सीरीज में नंबर लेना जरूरी है। सरकार का तर्क था कि यदि कोई व्यक्ति पसंदीदा नंबर चाहता है तो उसे नई सीरीज के अनुसार फीस देनी होगी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और 2019 का विवादित ज्ञापन रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं था जिसके आधार पर वह सिर्फ पत्र जारी कर अतिरिक्त शुल्क लगा सके। इसलिए यह आदेश कानून की नजर में गलत है।

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव शर्मा