हिसार : बैलगाड़ी से समुद्री जहाज तक, हड़प्पावासियों ने व्यापार के दम पर मजबूत की थी अर्थव्यवस्था
पुरातत्वविद् डॉ. वसंत शिंदे बोले—ओमान, मिस्र
और मेसोपोटामिया तक थे व्यापारिक संपर्क
राखीगढ़ी में हड़प्पा अनुसंधान केंद्र बनाने की जरूरत
हिसार, 25 अक्टूबर (हि.स.)। राखीगढ़ी की प्राचीन सभ्यता केवल अपने
विशाल नगरों और विकसित जीवनशैली के लिए ही नहीं, बल्कि उन्नत कृषि, परिवहन और दूर-दराज
के क्षेत्रों से व्यापारिक संबंधों के लिए भी जानी जाती है। हड़प्पा सभ्यता के लोगों
ने अपनी आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पहले बैलगाड़ियों के माध्यम से सामान
का परिवहन किया और बाद में समुद्री मार्गों से दूसरे क्षेत्रों तक व्यापारिक संपर्क
स्थापित किए। गुजरात के लोथल में हुई खुदाई में समुद्री व्यापार से जुड़े महत्वपूर्ण
पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं।
यह जानकारी डेक्कन कॉलेज के पूर्व कुलपति और विख्यात पुरातत्वविद्
डॉ. वसंत शिंदे ने रविवार काे राखीगढ़ी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान दी। डॉ. शिंदे ने कहा कि
सरस्वती-सिंधु सभ्यता के लोगों ने कृषि को आजीविका का प्रमुख आधार बनाया और बाद में
व्यापार के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था का विस्तार किया। उनके अनुसार, इस सभ्यता से
जुड़े लगभग दो हजार बसावट स्थलों की पहचान हुई है, जिनमें से करीब 1500 स्थल सरस्वती
नदी के आसपास बताए जाते हैं। नदियों के निकट पर्याप्त जल उपलब्ध होने के कारण खेती
के विकास को बढ़ावा मिला और लोगों ने धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियों का विस्तार किया।
कच्चा माल बाहर से लाकर तैयार करते थे उत्पाद
डॉ. वसंत शिंदे ने बताया कि हड़प्पा सभ्यता के लोग दूसरी जगहों से
तांबा, पत्थर, मनके बनाने के लिए कच्चा माल और अन्य वस्तुएं लाते थे। यहां इन वस्तुओं
को तैयार करने और उनकी फिनिशिंग करने के बाद दूसरे क्षेत्रों में भेजा जाता था। इस
प्रकार शिल्प और व्यापार एक-दूसरे के पूरक बनकर आर्थिक व्यवस्था को मजबूती देते थे। उन्होंने बताया कि उस समय के लोगों के व्यापारिक संपर्क ओमान, मिस्र
और मेसोपोटामिया जैसे क्षेत्रों तक फैले हुए थे। इन संपर्कों और व्यापारिक गतिविधियों
ने नगरों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राखीगढ़ी में नियोजित ढंग से बसाए
गए नगर, विकसित आवासीय व्यवस्था और शिल्प गतिविधियों के प्रमाण इस सभ्यता की उन्नत
जीवनशैली को समझने में मदद करते हैं।
डॉ. शिंदे ने कहा कि राखीगढ़ी विश्व की महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों
में शामिल है। यहां हड़प्पा अनुसंधान केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए, ताकि देश-विदेश
के शोधार्थी यहां आकर सभ्यता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन कर सकें। इसके साथ
ही ऐसा सूचना केंद्र भी विकसित किया जाना चाहिए, जहां पर्यटकों और विद्यार्थियों को
इस प्राचीन सभ्यता के बारे में विस्तृत जानकारी मिल सके।
राजा-रानी और बड़े मंदिरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले
हड़प्पा सभ्यता की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर चर्चा करते
हुए डॉ. शिंदे ने कहा कि अब तक मिले पुरातात्विक साक्ष्यों में राजा-रानी की व्यवस्था
के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं। इसी तरह बड़े मंदिरों और सेना के इस्तेमाल में आने
वाले हथियारों के बारे में भी निर्णायक प्रमाण सीमित हैं। ऐसे में उस समय की प्रशासनिक
व्यवस्था को समझने के लिए पुरातात्विक साक्ष्यों का गहन अध्ययन जरूरी है।
उन्होंने बताया कि इस सभ्यता से जुड़ी कुछ मुहरों पर धार्मिक प्रतीकों
और पशुपति से संबंधित माने जाने वाले चिह्नों के प्रमाण मिले हैं। विभिन्न स्थलों से
प्राप्त मूर्तियां, कलाकृतियां और अन्य अवशेष उस समय के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन
को समझने में मदद करते हैं।
डॉ. शिंदे ने अग्नि पूजा से जुड़े प्रमाणों का भी उल्लेख किया। उन्होंने
बताया कि धोलावीरा, कालीबंगा और राखीगढ़ी जैसे स्थलों पर अग्निकुंड मिलने की जानकारी
सामने आई है। इन साक्ष्यों के आधार पर प्राचीन धार्मिक परंपराओं और वैदिक साहित्य के
बीच संबंधों पर शोध की संभावनाएं बनी हुई हैं।
सभ्यता और साहित्य को साथ पढ़ने से सामने आएंगे नए तथ्य : डॉ. नरेंद्र
परमार
हरियाणा के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के उपनिदेशक डॉ. नरेंद्र
परमार ने कहा कि प्राचीन सभ्यता से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्यों और साहित्य का तुलनात्मक
अध्ययन किया जाए तो कई नए और रोचक तथ्य सामने आ सकते हैं। उन्होंने राखीगढ़ी के ऐतिहासिक
महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह स्थल प्राचीन मानव सभ्यता और उसके विकास को समझने
के लिए महत्वपूर्ण है।
डॉ. परमार ने बताया कि राखीगढ़ी में संग्रहालय को आधुनिक स्वरूप
देने की दिशा में काम किया जा रहा है। संग्रहालय के आंतरिक हिस्से को आधुनिक तकनीक
और प्रस्तुतीकरण के माध्यम से विकसित किया जाएगा। इसके लिए 188 करोड़ रुपये की राशि
मंजूर किए जाने की जानकारी भी उन्होंने दी। उन्होंने कहा कि भविष्य में राखीगढ़ी महोत्सव को और व्यापक स्तर
पर आयोजित करने की योजना है। इसके तहत कार्यक्रमों को केवल पुरातात्विक टीलों तक सीमित
न रखकर गांव के भीतर भी विभिन्न गतिविधियां आयोजित करने और स्थानीय लोगों को उनसे जोड़ने
का प्रयास किया जाएगा। इससे बाहर से आने वाले पर्यटकों को राखीगढ़ी की प्राचीन सभ्यता,
स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन को करीब से जानने का अवसर मिलेगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर

