सीबीआई काेर्ट से बैंक घोटाले के आरोपी की जमानत याचिका खारिज
चंडीगढ़, 09 अक्टूबर (हि.स.)। सीबीआई की विशेष अदालत ने बैंक घोटाले में जांच का सामना कर रहे हरियाणा पंचायत निदेशालय के सुपरिटेंडेंट प्रिंस शर्मा की नियमित जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है। केस की सुनवाई के दौरान सीबीआई ने अदालत को बताया कि कुछ खातों पर उनका पर्सनल मोबाइल नंबर रजिस्टर्ड था, जिनसे धोखाधड़ी वाले डेबिट ट्रांज़ैक्शन हुए थे।
सीबीआई ने हरियाणा के स्टेट विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन विभाग से यह केस अपने हाथ में लिया और 8 अप्रैल को एफआईआर दर्ज की। सीबीआई के विशेष न्यायाधीश विजयंत सहगल ने कहा कि आरोपों की प्रकृति, अपराध की गंभीरता, शर्मा की भूमिका और आगे की पेंडिंग जांच को देखते हुए, इस स्टेज पर ज़मानत का कोई आधार नहीं बनता है। चंडीगढ़ के रहने वाले 47 साल के प्रिंस शर्मा बीती 18 जून से हिरासत में हैं।
सीबीआई के मुताबिक, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में पंचायत निदेशालय के अकाउंट्स के लिए शर्मा का नंबर रजिस्टर्ड था। इसका इस्तेमाल पंचकूला म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के अकाउंट के लिए भी किया गया था, जिससे बड़ी रकम निकाली गई थी, जबकि उस संस्था से उनका कोई लेना-देना नहीं था। इन अकाउंट्स से करीब 160 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की गई थी।
सीबीआई का आरोप है कि अकाउंट खुलने और धोखाधड़ी वाले डेबिट के अलर्ट उनके नंबर पर जाते थे, जिससे विभागों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं को इन ट्रांज़ेक्शन के बारे में पता नहीं चलता था। एक्सिस बैंक के एक तीसरे अकाउंट में अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का नंबर इस्तेमाल किया गया था और वहां कोई धोखाधड़ी नहीं हुई थी। कोर्ट ने कहा कि इस स्टेज पर इस बात का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं है कि उन दो अकाउंट्स पर शर्मा का नंबर क्यों इस्तेमाल किया गया। सीबीआई के अनुसार, 13 अक्टूबर से 11 नवंबर, 2025 के बीच, जब कई अनधिकृत डेबिट ट्रांज़ैक्शन हुए, तब वह सिम शर्मा के हैंडसेट में था।
शर्मा के वकील संजय वर्मा ने दलील दी कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया है और ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें लापरवाह कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि अकाउंट्स को ऑपरेट करने में शर्मा की कोई भूमिका नहीं थी और पैसे के लेन-देन का कोई भी सुराग उन तक नहीं जाता है। बचाव पक्ष ने कहा कि उन्होंने सीनियर अधिकारियों के कहने पर सिम कार्ड सौंप दिया था।
कोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के अकाउंट में शर्मा का नंबर कैसे आया। कोर्ट ने माना कि सह-आरोपी का बयान और अंदरूनी जांच रिपोर्ट, जांच के दौरान मिले सबूतों को गलत साबित नहीं कर सकते। साथ ही, अभियोजन पक्ष ने प्रथम दृष्टया साजिश में उनकी सक्रिय भूमिका की ओर इशारा किया है। सिम का गलत इस्तेमाल दूसरों ने किया या शर्मा ने उसे सौंप दिया, यह मामला ट्रायल के लिए छोड़ दिया गया।
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव शर्मा

