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हिसार : पशुओं का दूध और सेहत बढ़ाएगी ‘सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार’ ज्वार

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हिसार : पशुओं का दूध और सेहत बढ़ाएगी ‘सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार’ ज्वार


‘सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार’ से बढ़ेगा भैंसों का

दूध उत्पादन

पशु पोषण में सुधार के लिए आईसीएआर के दो शीर्ष संस्थानों ने मिलाया हाथ

केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान को सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार पर अनुसंधान परियोजना

सौंपी

उन्नत चारा किस्म ‘सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार’ पर शुरू किया वैज्ञानिक अनुसंधान

हिसार, 07 जुलाई (राजेश्वर बैनीवाल)। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत

आने वाले ग्लोबल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन मिलेट्स ने दुग्ध उत्पादन बढ़ाने और पशु पोषण

को बेहतर करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। संस्थान ने यहां स्थित केंद्रीय भैंस

अनुसंधान संस्थान (सीआईआरबी) के न्यूट्रिशन डिवीजन को ‘सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार’ (ब्राउन मिडरिब) पर

शोध करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ी अनुसंधान परियोजना सौंपी है। यह पूरी परियोजना

संस्थान के जाने-माने वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभिजीत डे के मार्गदर्शन में पूरी की जाएगी।

क्या है परियोजना का उद्देश्य?

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत सीआईआरबी के रिसर्च फार्म में विशेष रूप

से सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार की खेती की जाएगी। इस उन्नत किस्म से तैयार होने वाले लहलहाते

हरे चारे को भैंसों को खिलाया जाएगा। इसके बाद वैज्ञानिकों की एक टीम इस बात का बारीकी

से वैज्ञानिक अध्ययन करेगी कि इस चारे से भैंसों के दुग्ध उत्पादन में कितनी वृद्धि

होती है। पोषक तत्वों की पाचन क्षमता पर क्या असर पड़ता है, पशुओं के समग्र स्वास्थ्य

और प्रदर्शन में क्या सकारात्मक बदलाव आते हैं।

‘सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार’ की क्या है ख्यासियत

?

वैज्ञानिकों के अनुसार, चारे की यह नई किस्म सामान्य चारे के मुकाबले कई गुना

अधिक फायदेमंद है। इस उन्नत किस्म की सबसे बड़ी यूएसपी यह है कि इसमें ‘लिग्निन’ की मात्रा बहुत कम

होती है। लिग्निन एक ऐसा तत्व है जो चारे को सख्त बनाता है और पशु उसे आसानी से पचा

नहीं पाते। लिग्निन कम होने के कारण भैंसें इसे बेहद आसानी से पचा लेती हैं, जिससे

उनके शरीर को पूरा पोषण मिलता है और सीधे तौर पर दूध देने की क्षमता बढ़ जाती है। यह

एक ‘सिंगल-कट’ ज्वार की किस्म है।

इसके हरे चारे की औसत पैदावार 300 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है, जिससे

किसानों को चारे की कमी से जूझना नहीं पड़ेगा। इस चारे में क्रूड प्रोटीन की मात्रा

लगभग 8 से 9 प्रतिशत पाई जाती है, जो पशुओं के शारीरिक विकास और गाढ़े व गुणवत्तापूर्ण

दूध के लिए बेहद जरूरी है।

इन राज्यों की मिट्टी के लिए है वरदान

कृषि वैज्ञानिकों ने इस किस्म को हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, गुजरात,

महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे प्रमुख राज्यों के मौसम और मिट्टी के लिए सबसे

उपयुक्त और उत्तम माना है। हाल ही में केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान में आयोजित एक राष्ट्रीय स्तर के

किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रगतिशील किसानों

ने इस तकनीक को लाइव देखा।

परियोजना के मुख्य मार्गदर्शक डॉ. अभिजीत डे ने किसानों

को संस्थान के खेतों का दौरा कराया और लहलहा रही ‘सीएसवी-59 बीएमआर ज्वार’ की फसल दिखाते हुए

इसके पोषण मूल्य और डेयरी व्यवसाय में होने वाले बंपर मुनाफे के बारे में विस्तार से

समझाया। नई किस्म के जादुई फायदों को देखकर किसानों ने भारी उत्साह दिखाया और भविष्य

में अपने खेतों में इस उन्नत चारे को उगाने का संकल्प लिया।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश्वर