फोन अपडेट के नाम पर खाते खाली, गोवा से दो मास्टरमाइंड गिरफ्तार
नई दिल्ली, 22 मई (हि.स.)। मोबाइल फोन में आने वाला एक सामान्य सॉफ्टवेयर अपडेट कैसे बैंक खाते खाली कर सकता है, इसका बड़ा उदाहरण बाहरी-उत्तरी जिला पुलिस ने सामने लाया है। दिल्ली पुलिस की साइबर थाना टीम ने दिल्ली, गोवा और राजस्थान तक फैले एक बड़े अंतरराज्यीय साइबर ठगी और कैश कन्वर्जन नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए दो आरोपितों को गोवा से गिरफ्तार किया है। जांच में खुलासा हुआ है कि गिरोह साइबर ठगी के जरिए लोगों के खातों से रकम निकालने के बाद उसे डिजिटल चैनलों से नकदी में बदल देता था, ताकि पैसे के स्रोत को छिपाया जा सके। पुलिस जांच में अब तक करीब 40 लाख रुपये के लेनदेन का पता चला है।
बाहरी उत्तरी जिले के पुलिस उपायुक्त हरेश्वर स्वामी ने शुक्रवार को बताया कि साइबर इेस्पेक्टर इंस्पेक्टर गोविंद सिंह की देखरेख में गठित विशेष टीम ने कई राज्यों में कार्रवाई करते हुए आरोपितों तक पहुंच बनाई। आरोपितों की पहचान जयपुर निवासी अर्जुन लाल यादव और सीकर राजस्थान निवासी दीपेंद्र महाला के रूप में हुई है।
मोबाइल अपडेट बना साइबर अपराधियों का हथियार
पुलिस उपायुक्त के मुताबिक पूरे मामले की शुरुआत पिछले साल आई एक शिकायत से हुई। पीड़ित ने बताया कि उसके मोबाइल फोन में नियमित सिस्टम या सॉफ्टवेयर अपडेट के दौरान तकनीकी सेंधमारी हो गई। शुरुआत में उसे किसी गड़बड़ी का अहसास नहीं हुआ, लेकिन कुछ देर बाद उसके बैंक खाते और उसकी मां के बैंक खाते से जुड़े पेटीएम अकाउंट से रकम निकलने की जानकारी सामने आई। जांच में सामने आया कि साइबर अपराधियों ने तकनीकी खामी का फायदा उठाकर पीड़ित के मोबाइल सिस्टम तक पहुंच बनाई और बैंकिंग एप्लीकेशन से जुड़ी जानकारी हासिल कर ली। इसके बाद कुछ ही मिनटों में आरोपितों ने करीब डेढ़ लाख रुपये विभिन्न डिजिटल चैनलों के जरिए निकाल लिए। पीड़ित ने तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई। शिकायत मिलने के बाद बाहरी-उत्तरी जिला साइबर थाना पुलिस ने ई-एफआईआर संख्या 00047/2025 दर्ज कर तकनीकी जांच शुरू कर दी।
डिजिटल लेनदेन की परतें खोलते हुए गोवा तक पहुंची पुलिस
पुलिस उपायुक्त के अनुसार साइबर थाना टीम ने बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल ट्रांजेक्शन और तकनीकी डेटा की गहन जांच शुरू की। पुलिस ने पैसों की आवाजाही को ट्रैक करना शुरू किया। जांच के दौरान एक अहम सुराग मिला, जब पुलिस को पता चला कि ठगी की रकम में से 98 हजार रुपये दक्षिण गोवा के वास्को स्थित एक एचपी सर्विस स्टेशन में ट्रांसफर हुए थे। यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम ने गोवा का रुख किया। वहां स्थानीय स्तर पर जांच, निगरानी और तकनीकी विश्लेषण के जरिए पुलिस ने पूरे नेटवर्क की कार्यप्रणाली को समझना शुरू किया। पुलिस जांच में सामने आया कि गिरोह बेहद संगठित तरीके से काम कर रहा था। साइबर अपराधी पहले लोगों के बैंक खातों से डिजिटल माध्यम से रकम निकालते थे। इसके बाद यह रकम विभिन्न कारोबारी प्रतिष्ठानों के जरिए दूसरे खातों में ट्रांसफर कराई जाती थी।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक गिरोह के सदस्य व्हाट्सएप पर भुगतान संबंधी जानकारी प्राप्त करते थे। डिजिटल भुगतान की पुष्टि होने के बाद कमीशन काटकर बराबर राशि नकद में उपलब्ध कराई जाती थी। इस प्रक्रिया के जरिए ऑनलाइन ठगी से हासिल रकम को नकदी में बदल दिया जाता था, जिससे जांच एजेंसियों के लिए रकम की वास्तविक आवाजाही पकड़ना मुश्किल हो जाए। जांच में सामने आया कि आरोपित इस नेटवर्क के जरिए करीब 40 लाख रुपये की रकम को डिजिटल माध्यम से निकालकर नकदी में बदल चुके थे।
तकनीकी निगरानी, मोबाइल डेटा विश्लेषण और स्थानीय इनपुट के आधार पर पुलिस की टीम ने दक्षिण गोवा के मडगांव इलाके में दबिश दी। कार्रवाई के दौरान पुलिस ने दो मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के दौरान दोनों आरोपितों ने खुलासा किया कि गोवा में डिजिटल रकम को नकदी में बदलने के बाद उसे राजस्थान में बैठे गिरोह के अन्य संचालकों तक पहुंचाया जाता था।
पुलिस को जांच के दौरान दीपेंद्र महाला के मोबाइल फोन से अहम डिजिटल साक्ष्य भी मिले। उसके मोबाइल में वह व्हाट्सएप नंबर सक्रिय मिला, जिसके जरिए कथित तौर पर ठगी की रकम को नकदी में बदलने से जुड़े निर्देश और भुगतान संबंधी जानकारी साझा की जाती थी।
पुलिस उपायुक्त के अनुसार पुलिस ने आरोपितों के कब्जे से एक लाख 95 हजार रुपये नकद, एक महिंद्रा थार एसयूवी, एक लैपटॉप, चार मोबाइल फोन, तीन एटीएम कार्ड और तीन चेक बुक बरामद की हैं।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / कुमार अश्वनी

