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फर्जी सेल डीड बनाकर बैंकों से 18 करोड़ से ज्यादा की ठगी, नौ साल से फरार घोषित अपराधी गिरफ्तार

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फर्जी सेल डीड बनाकर बैंकों से 18 करोड़ से ज्यादा की ठगी, नौ साल से फरार घोषित अपराधी गिरफ्तार


नई दिल्ली, 27 जून (हि.स.)। दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने फर्जी सेल डीड, फर्जी पहचान और शेल कंपनियों के जरिए बैंकों से 18 करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी करने वाले नौ साल से फरार घोषित अपराधी को गिरफ्तार किया है। आरोपित 2017 से कानून से बचता फिर रहा था और अदालत ने उसे भगाेड़ा घोषित कर रखा था। लगातार तकनीकी निगरानी और लंबी जांच के बाद ईओडब्ल्यू ने आरोपित को तिहाड़ जेल से प्रोडक्शन वारंट पर गिरफ्तार किया।

गिरफ्तार आरोपित की पहचान संजीव दीक्षित उर्फ संजय शर्मा (53) निवासी विज्ञान लोक, नई दिल्ली के रूप में हुई है। उसके खिलाफ दिल्ली, उप्र और सीबीआई की विभिन्न इकाइयों में धोखाधड़ी, जालसाजी, भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के 12 आपराधिक मामले दर्ज हैं। वह फर्जी पहचान के लिए 'संजीव गांधी' नाम का भी इस्तेमाल करता था।

ईओडब्ल्यू के अनुसार, वर्ष 2013 में विवेक विहार फेज-1 निवासी उषा रानी सेठी की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संजीव दीक्षित ने अपने साथियों के साथ मिलकर उनकी जानकारी और सहमति के बिना उनकी संपत्ति की 16 फरवरी 2013 की फर्जी सेल डीड तैयार करवाई। आरोपिताें ने सब-रजिस्ट्रार-8 कार्यालय में एक महिला को शिकायतकर्ता बनाकर पेश किया। इसके लिए ओडिशा के भद्रक निवासी उसी नाम की दूसरी महिला उषा रानी सेठी के पैन कार्ड का इस्तेमाल किया गया। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति अपने नाम दिखाकर उसे गिरवी रख दिया गया और बैंकों से करोड़ों रुपये का कर्ज हासिल कर लिया।

18 करोड़ से अधिक की बैंक धोखाधड़ी

जांच में सामने आया कि फर्जी सेल डीड के आधार पर आरोपियों ने चाइनाट्रस्ट कमर्शियल बैंक, कनॉट प्लेस से 10 करोड़ रुपये की क्रेडिट सुविधा मंजूर कराई, जिसमें से 4.75 करोड़ रुपये जारी हुए। इसके अलावा 5 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट, 70 लाख रुपये का कार लोन तथा अन्य बैंकों से 3 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट लिमिट भी फर्जी संपत्ति के दस्तावेजों के आधार पर हासिल की गई। बाद में सभी लोन खाते एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) घोषित हो गए।

किरायेदार बनकर जुटाई संपत्ति की जानकारी

जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी ने पहले अपने साथी सचिन भारद्वाज और अन्य सहयोगियों को शिकायतकर्ता की संपत्ति में किरायेदार बनवाया। इससे उन्हें संपत्ति के स्वामित्व, दस्तावेजों और रजिस्ट्रेशन से जुड़ी पूरी जानकारी मिल गई। इसके बाद उसी नाम के दूसरे व्यक्ति के पैन कार्ड का इंतजाम किया गया और एक महिला को असली मालिक बनाकर सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पेश किया गया। वहां फर्जी सेल डीड का पंजीकरण करा लिया गया। इसी फर्जी दस्तावेज के आधार पर कई बैंकों से भारी भरकम ऋण लिया गया। पुलिस के अनुसार, बैंक से मिले पैसे को सीधे इस्तेमाल करने के बजाय आरोपी ने रकम को कई शेल कंपनियों और फर्जी बैंक खातों के जरिए घुमाया, ताकि मनी ट्रेल छिपाई जा सके। बाद में रकम नकद निकाली गई और निजी खर्चों में इस्तेमाल कर दी गई।

2017 से था फरार, अदालत ने घोषित किया था उद्घोषित अपराधी

मामले की जांच के दौरान आरोपी को कई बार नोटिस भेजे गए, लेकिन वह जांच में शामिल नहीं हुआ। लगातार फरार रहने पर 4 जुलाई 2017 को अदालत ने संजीव दीक्षित और उसके साथी सचिन भारद्वाज को उद्घोषित अपराधी घोषित कर दिया। पुलिस की टीम वर्षों तक उसकी तलाश में संभावित ठिकानों पर छापेमारी करती रही। तकनीकी निगरानी, स्थानीय जांच और विभिन्न राज्यों में लगातार प्रयासों के बावजूद वह पुलिस की पकड़ से बाहर रहा।

तिहाड़ जेल में होने की मिली सूचना, प्रोडक्शन वारंट पर गिरफ्तारी

ईओडब्ल्यू की जांच के दौरान एसआई राहुल और इंस्पेक्टर राजपाल मीणा ने एसीपी विनोद गांधी की निगरानी में लगातार तकनीकी निगरानी और सत्यापन किया। जांच में पता चला कि आरोपी किसी अन्य आपराधिक मामले में तिहाड़ जेल संख्या-7 में बंद है। इसके बाद शाहदरा जिला स्थित कड़कड़डूमा कोर्ट से प्रोडक्शन वारंट हासिल किया गया। 25 जून 2026 को आरोपी को अदालत में पेश किया गया, जहां ईओडब्ल्यू ने उसे इस मामले में औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार संजीव दीक्षित एक आदतन आर्थिक अपराधी है। उसके खिलाफ सीबीआई/एसीबी गाजियाबाद, सीबीआई/एसीबी दिल्ली, सीबीआई बीएस एंड एफसी तथा दिल्ली, सोनीपत और उत्तर प्रदेश के विभिन्न थानों में कुल 12 मामले दर्ज हैं। इन मामलों में धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी फर्जी पहचान, जाली संपत्ति दस्तावेज, शेल कंपनियां और फर्जी बैंक खातों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर बैंक धोखाधड़ी करता था। वह अपनी पहचान छिपाने के लिए 'संजीव गांधी' नाम का भी इस्तेमाल करता था और सहयोगियों के जरिए लेन-देन कराता था।

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हिन्दुस्थान समाचार / कुमार अश्वनी