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शिमला : पांच साल में 391 ड्रग तस्कर गिरफ्तार, सिर्फ एक चौथाई को मिली सजा

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शिमला : पांच साल में 391 ड्रग तस्कर गिरफ्तार, सिर्फ एक चौथाई को मिली सजा


शिमला, 19 जनवरी (हि.स.)। नशे के खिलाफ सख्त कानून होने के बावजूद ड्रग्स तस्करी के मामलों में जिला शिमला में सजा की दर बेहद कम बनी हुई है। पिछले पाँच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि शिमला पुलिस ने भले ही नशा तस्करों के खिलाफ कई अभियान चलाए, गिरोहों का पर्दाफाश किया और बड़े ड्रग पैडलरों को गिरफ्तार किया, लेकिन अदालतों में ये मामले ज़्यादातर टिक नहीं पाए। नतीजा यह रहा कि पकड़े गए आरोपियों में से केवल एक चौथाई को ही सजा मिल सकी।

वर्ष 2021 से 2025 के बीच शिमला जिले में एनडीपीएस एक्ट के तहत ड्रग्स से जुड़े कुल 391 मामले दर्ज किए गए। इनमें चिट्टा और अन्य नशीले पदार्थों की तस्करी के मामले शामिल हैं। इन 391 मामलों में से सिर्फ 98 मामलों में ही अदालतों से दोषसिद्धि हो पाई, जबकि 293 मामलों में आरोपी दोषमुक्त हो गए। यानी नशा तस्करी के मामलों में सजा की दर महज 26 प्रतिशत रही।

यह खुलासा शिमला में नशे और अन्य गंभीर अपराधों को लेकर आयोजित एक जिला स्तरीय कार्यशाला में हुआ।

कार्यशाला में एनडीपीएस एक्ट 1985 के साथ-साथ एससी-एसटी एक्ट 1989 और पॉक्सो एक्ट 2012 के तहत दर्ज मामलों और उनकी दोषसिद्धि दर पर भी चर्चा की गई। इसमें जिले के सभी एसडीएम, डीएसपी, थाना प्रभारी, अभियोजन अधिकारी, जिला न्यायवादी, स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक न्याय से जुड़े अधिकारी मौजूद रहे। कार्यशाला का मकसद यह समझना था कि जांच और ट्रायल के दौरान कहां-कहां कमियां रह जाती हैं, जिनकी वजह से आरोपी अदालत से छूट जाते हैं।

जिला न्यायवादी सुधीर शर्मा ने बताया कि एनडीपीएस एक्ट के तहत पिछले पाँच वर्षों में दर्ज 391 मामलों में से केवल 98 में ही सजा हो पाई। वर्ष 2021 में 20 मामलों में से 5 में, 2022 में 29 मामलों में से 9 में, 2023 में 91 मामलों में से 21 में, 2024 में 107 मामलों में से 25 में और 2025 में 144 मामलों में से 38 मामलों में दोषसिद्धि हुई। हर साल दोषमुक्त होने वाले आरोपियों की संख्या सजा पाने वालों से कहीं ज्यादा रही।

कार्यशाला में पॉक्सो एक्ट के मामलों के आंकड़े भी सामने आए। वर्ष 2021 से 2025 के बीच पॉक्सो एक्ट के 138 मामले अदालत तक पहुंचे, लेकिन इनमें से सिर्फ 49 मामलों में ही दोषसिद्धि हो पाई। कुल मिलाकर इस कानून के तहत सजा की दर 35 प्रतिशत रही। कुछ वर्षों में यह दर बेहतर रही, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें गिरावट दर्ज की गई।

उपायुक्त शिमला अनुपम कश्यप ने कहा कि अगर पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है तो यह पूरी व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि जब बड़ी संख्या में आरोपी दोषमुक्त हो जाते हैं, तो आम लोगों का कानून और प्रशासन से भरोसा कमजोर होता है। इससे अपराधियों में कानून का डर भी खत्म हो जाता है।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजीव कुमार गांधी ने माना कि एनडीपीएस, एससी-एसटी और पॉक्सो जैसे गंभीर कानूनों में दोषमुक्ति की ऊंची दर पुलिस के लिए भी चुनौती है। उन्होंने जांच अधिकारियों से कहा कि निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित जांच जरूरी है जिससे अदालत में मामले मजबूती से रखे जा सकें।

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हिन्दुस्थान समाचार / उज्जवल शर्मा