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29 साल बाद मिला इंसाफ : दिल्ली पुलिस ने 1997 के ब्लाइंड मर्डर केस का आरोपित लखनऊ से पकड़ा

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29 साल बाद मिला इंसाफ : दिल्ली पुलिस ने 1997 के ब्लाइंड मर्डर केस का आरोपित लखनऊ से पकड़ा


- पहचान छिपाकर 'अली भाई' बनकर रह रहा था

नई दिल्ली, 06 जुलाई (हि.स.)। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने करीब 29 साल पुराने हत्या के मामले का खुलासा करते हुए फरार चल रहे आरोपित को लखनऊ (उप्र) से गिरफ्तार किया है। आरोपित 1997 से लगातार पुलिस को चकमा दे रहा था और अपनी पहचान बदलकर 'अली भाई' के नाम से महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में रह रहा था। क्राइम ब्रांच ने तकनीकी निगरानी, मुखबिर तंत्र और महीनों की पड़ताल के बाद उसे 3 जुलाई 2026 को ठाकुरगंज, लखनऊ से दबोच लिया।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित की पहचान मोहम्मद फहीम उर्फ अली भाई के रूप में हुई है। वह वर्ष 1997 में राजौरी गार्डन थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 230/1997 में हत्या के मामले में वांछित था। उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत मामला दर्ज था। आरोपी के लगातार फरार रहने पर 14 अक्टूबर 1997 को अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया था और उसके खिलाफ तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 299 के तहत कार्रवाई शुरू की गई थी।

लकड़ी के दीवान में छिपाई थी लाश

पुलिस के मुताबिक, 14 मार्च 1997 को रघुबीर नगर स्थित टीसी कैंप के एक कमरे से एक अज्ञात व्यक्ति का शव बरामद हुआ था। जांच में मृतक की पहचान फैजाबाद (अब अयोध्या) निवासी 58 वर्षीय शरीफ हसन खान के रूप में हुई, जो दिल्ली के राजौरी गार्डन स्थित एक कपड़ों की दुकान में काम करता था। जांच में सामने आया कि आरोपित मोहम्मद फहीम रोजगार की तलाश में दिल्ली आया था और उसकी मृतक से जान-पहचान थी। 13 मार्च 1997 को दोनों के बीच पैसों की चोरी को लेकर विवाद हो गया। आरोप है कि गुस्से में फहीम ने लोहे की रॉड से कई वार कर शरीफ हसन खान की हत्या कर दी। इसके बाद रस्सी से गला घोंटकर मौत सुनिश्चित की और शव को कमरे में रखे लकड़ी के दीवान बॉक्स में छिपाकर फरार हो गया।

29 साल तक बदलता रहा ठिकाने

पुलिस ने बताया कि हत्या के बाद आरोपी पहले नागपुर भाग गया। इसके बाद उसने मुंबई, लखनऊ और नागपुर समेत कई शहरों में ठिकाने बदल-बदलकर रहना शुरू कर दिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए उसने अपनी पहचान छिपाकर 'अली भाई' नाम अपना लिया। इस दौरान वह प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) का कारीगर बनकर काम करता रहा और लगातार पुलिस की नजरों से बचता रहा।

ऐसे पहुंची पुलिस तक

हाल ही में इस पुराने मामले की जांच क्राइम ब्रांच की सेंट्रल रेंज को सौंपी गई। क्राइम ब्रांच के पुलिस उपायुक्त आदित्य गौतम के मार्गदर्शन और एसीपी सतेंद्र मोहन की निगरानी में इंस्पेक्टर सुनील कुमार कलखंडे के नेतृत्व में गठित टीम ने केस की दोबारा समीक्षा शुरू की। जांच अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आरोपी करीब 29 वर्षों से फरार था, उसकी कोई हालिया तस्वीर उपलब्ध नहीं थी और यह मामला उस दौर का था जब डिजिटल रिकॉर्ड और आधुनिक तकनीकी जांच की सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। टीम ने आरोपित के पैतृक गांव में स्थानीय स्तर पर सूचना तंत्र विकसित किया। पता चला कि वह जीवित है और समय-समय पर गांव आता-जाता है। लगातार निगरानी के बाद उसकी मौजूदगी लखनऊ के चौक कोतवाली क्षेत्र में मिली। पुख्ता सूचना मिलने पर 3 जुलाई को ठाकुरगंज इलाके में छापेमारी कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

पूछताछ में कबूला जुर्म

पूछताछ के दौरान आरोपित ने अपनी असली पहचान मोहम्मद फहीम के रूप में स्वीकार करते हुए हत्या में शामिल होने की बात कबूल की। उसने बताया कि पैसों के विवाद के चलते उसने शरीफ हसन खान की हत्या की थी और उसके बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार शहर बदलता रहा। गिरफ्तार आरोपित मोहम्मद फहीम उर्फ अली भाई मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले का रहने वाला है। फिलहाल वह लखनऊ के ठाकुरगंज स्थित हुसैनाबाद इलाके में रह रहा था। वह निरक्षर है और पीओपी कारीगर के रूप में काम करता था। दिल्ली पुलिस का कहना है कि यह गिरफ्तारी लगभग तीन दशक पुराने हत्या के मामले में बड़ी सफलता है। आधुनिक तकनीकी निगरानी, स्थानीय सूचना तंत्र और लगातार प्रयासों के दम पर आरोपित को कानून के शिकंजे तक पहुंचाया गया, जिससे 29 साल पुराने मामले में पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की दिशा में अहम सफलता मिली है।

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हिन्दुस्थान समाचार / कुमार अश्वनी