झीरम नरसंहार के षड्यंत्रकारियाें से जब तक पूछताछ नहीं होती, झीरम का निर्णय अधूरा रहेगा : उमाशंकर शुक्ला
जगदलपुर, 06 सितंबर (हि.स.)। प्रदेश कांग्रेस के संयुक्त महासचिव उमाशंकर शुक्ला ने रविवार काे जारी विज्ञप्ति में कहा कि बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई 2013 को नक्सलियाें द्वारा किया गया नरसंहार भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे दर्दनाक और भयावह नक्सली वारदात है। उन्हाेंने कहा कि जब तक षड्यंत्रकारियाें से पूछताछ नही होती तब तक झीरम का निर्णय अधूरा रहेगा।
इस हमले में नक्सलियाें ने कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा और उदय मुदलियार सहित 32 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने इस मामले में 10 नक्सलियों को दोषी पाया है। इनकी सजा 16 सितंबर को सजा सुनाई जाएगी।
उन्हाेने कहा कि ऊपरी तौर पर देखने पर यह न्याय की जीत लग सकती है, लेकिन तकनीकी और कानूनी धरातल पर एक सुनियोजित “राजनैतिक षड्यंत्र” काे लेकर इस फैसला पर कुछ नहीं कहा जाना मुख्य षड्यंत्रकारियाें काे बचाने या मार्च 2026 से बस्तर नक्सल मुक्त घोषित हाेने के बाद बस्तर के बदले हुए हालात की बड़ी उपलब्धि काे बनाये रखना है। जब तक उन शीर्ष नक्सली कमांडरों काे मामले में शामिल कर उनसे पूछ-ताछ नहीं होती जिन्होंने इस नरसंहार की याेजना बनाई तब तक झीरम का निर्णय अधूरा ही रहेगा।
उमा शंकर शुक्ला ने कहा कि झीरम नक्सली वारदात में शामिल कई ऐसे बड़े नक्सली कैडरों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया, जो उस समय बस्तर और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी में सक्रिय थे। झीरम नरसंहार की योजना बिना शीर्ष कैडर की मंजूरी के संभव ही नहीं थी। लेकिन जांच एजेंसियों ने आत्मसमर्पण कर चुके इन शीर्ष नक्सली कैडरों से पूछताछ करने या उन्हें मामले में मुख्य गवाह या आरोपी बनाने में कोई रुचि नहीं दिखाई। इससे हमले का सच सामने ही नहीं आ सका। जिन 10 आरोपितों को सजा सुनाई गई है, वे मुख्य रूप से निचले कैडर के नक्सली या उनके मददगार की भूमिका में हो सकते थे। सिर्फ निचले स्तर के कैडर को सजा देने से यह मामला कहीं न कहीं अधूरा रह गया। झीरम घाटी नरसंहार के 10 निचले स्तर के नक्सलियों को सजा मिलना इसे “पूर्ण न्याय” नहीं कहा जा सकता।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

