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रंग पंचमी पर पंतोरा में अनोखी लट्ठमार होली, कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से निभाती हैं सदियों पुरानी परंपरा

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रंग पंचमी पर पंतोरा में अनोखी लट्ठमार होली, कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से निभाती हैं सदियों पुरानी परंपरा


रंग पंचमी पर पंतोरा में अनोखी लट्ठमार होली, कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से निभाती हैं सदियों पुरानी परंपरा


जांजगीर-चांपा, 08 मार्च (हि. स.)। जिले से कुछ किलोमीटर दूर कोरबा रोड पर स्थित पंतोरा गांव में होली का पर्व हर साल खास अंदाज में मनाया जाता है। यहां रंग और गुलाल के साथ मनाई जाने वाली होली की असली पहचान आज रविवार को रंग पंचमी के दिन खेली जाने वाली अनोखी लट्ठमार होली है। राधा के गांव बरसाना की तर्ज पर पंतोरा में भी यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। स्थानीय भाषा में इस अनोखी परंपरा को ‘डंगाही होली’ कहा जाता है, जिसमें गांव की कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से ग्रामीणों को सांकेतिक रूप से स्पर्श करती हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि इस छड़ी का स्पर्श आशीर्वाद के समान होता है और इससे बीमारियां दूर होती हैं तथा जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यही कारण है कि इस परंपरा का गांव में विशेष महत्व है और हर वर्ष बड़ी संख्या में ग्रामीण इसमें शामिल होते हैं।

स्थानीय निवासी राजेश तिवारी बताते हैं कि बलौदा ब्लॉक के पंतोरा गांव में स्थित मां भवानी मंदिर परिसर में रंग पंचमी के दिन यह अनोखा आयोजन होता है। इस परंपरा की शुरुआत रंग पंचमी से एक दिन पहले ही हो जाती है। पूर्व संध्या पर गांव के ग्रामीण कोरबा जिले के मड़वारानी के जंगल से विशेष बांस की छड़ी लाते हैं। इस छड़ी को चुनने की भी एक खास परंपरा है। जिस बांस की छड़ी को एक ही कुल्हाड़ी के वार में काटा जाता है, उसी छड़ी को इस पर्व के लिए चुना जाता है। इसके बाद उस बांस की छड़ी की विधि-विधान से पूजा की जाती है।

रंग पंचमी के दिन मां भवानी मंदिर में उस छड़ी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और यह कामना की जाती है कि गांव में किसी प्रकार की बीमारी न फैले तथा सभी ग्रामीण सुखी और स्वस्थ रहें। मंदिर में माता की पूजा के बाद कुंवारी कन्याओं द्वारा उस अभिमंत्रित बांस की छड़ी को पांच बार मां भवानी को स्पर्श कराया जाता है। इसके बाद मंदिर परिसर में विराजमान अन्य देवी-देवताओं को भी उसी छड़ी से स्पर्श कराया जाता है। धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद मंदिर के बैगा (पंडित) द्वारा यह छड़ी कुंवारी कन्याओं को सौंप दी जाती है।

इसके बाद मंदिर परिसर के बाहर खड़े ग्रामीणों, बच्चों और बुजुर्गों को कुंवारी कन्याएं उस छड़ी से सांकेतिक रूप से स्पर्श करती हैं। यहां की सबसे खास बात यह है कि इस छड़ी का स्पर्श पाने के लिए लोग स्वयं आगे आते हैं। यहां तक कि रास्ते से गुजरने वाले राहगीर भी इस अनोखी परंपरा में शामिल होने के लिए रुक जाते हैं और छड़ी का स्पर्श ग्रहण करते हैं। इसे कोई भी बुरा नहीं मानता, बल्कि इसे आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया जाता है।

इस दौरान मंदिर परिसर में रंग और गुलाल के साथ उत्सव जैसा माहौल बन जाता है। ग्रामीण एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और पूरे गांव में खुशियों का वातावरण दिखाई देता है। ग्रामीणों का मानना है कि जब से यह परंपरा शुरू हुई है, तब से गांव में किसी प्रकार की गंभीर बीमारी नहीं फैली है। इसलिए यह परंपरा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि गांव की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन चुकी है।

पंतोरा गांव के लोग इस परंपरा को अपनी सांस्कृतिक पहचान मानते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इसे सहेजकर आगे बढ़ा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आने वाली पीढ़ियां भी इसी तरह इस अनोखी परंपरा को निभाती रहेंगी और मां भवानी की कृपा पूरे गांव पर बनी रहेगी।

हिन्दुस्थान समाचार/लालिमा शुक्ला पुरोहित

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हिन्दुस्थान समाचार / LALIMA SHUKLA PUROHIT