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कार्यस्थल पर तनाव से बचने समय प्रबंधन और सकारात्मक व्यवहार जरूरी : डाॅ. द्विवेदी

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कार्यस्थल पर तनाव से बचने समय प्रबंधन और सकारात्मक व्यवहार जरूरी : डाॅ. द्विवेदी


तनाव प्रबंधन विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला

एक दिवसीय कार्यशाला में तनाव प्रबंधन के बताए व्यावहारिक उपाय, योग, प्राणायाम और भावनात्मक संतुलन पर दिया जोर

धमतरी, 02 नवंबर (हि.स.)। कार्यस्थल पर बढ़ते दबाव, समय की कमी और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच तनाव प्रबंधन आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है। लंबे समय तक तनाव में रहने से न केवल व्यक्ति की मानसिक स्थिति प्रभावित होती है, बल्कि उसकी कार्यक्षमता में भी गिरावट आती है। इन परिस्थितियों से निपटने और सकारात्मक कार्य वातावरण विकसित करने के उद्देश्य से सोमवार को महाविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) द्वारा कार्यस्थल में तनाव प्रबंधन विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई।

मुख्य वक्ता मनोविज्ञान की सहायक प्राध्यापक डाॅ. सरला द्विवेदी ने कार्यस्थल पर तनाव उत्पन्न होने के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय प्रबंधन की कमी, अचानक उत्पन्न होने वाली अप्रत्याशित परिस्थितियां, सहकर्मियों का अनुचित व्यवहार और संप्रेषण कौशल का अभाव तनाव के प्रमुख कारण हैं। लगातार तनाव में रहने से व्यक्ति अवसादपूर्ण स्थिति में पहुंच सकता है और उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। उन्होंने तनाव से निपटने के लिए चार प्रमुख उपाय बताए। इनमें तनावपूर्ण कार्यों को टालना, बदलाव के अनुरूप स्वयं को ढालना, परिस्थितियों को स्वीकार कर प्राथमिकता के अनुसार कार्य करना तथा कम आवश्यक कार्यों को टालना या दूसरों को सौंपना शामिल है। उन्होंने अल्पकालिक तनाव से राहत पाने के लिए योग, प्राणायाम और गहरी सांस लेने की तकनीकों को उपयोगी बताया। बॉक्स ब्रीदिंग, बैली ब्रीदिंग और बीच-बीच में रिफ्रेशमेंट ब्रेक लेने से मानसिक तनाव कम करने में मदद मिलती है।

उन्होंने कहा कि कार्यस्थल पर बहस या विवाद की स्थिति बनने पर कुछ समय के लिए वहां से हट जाना भी तनाव कम करने का प्रभावी तरीका है। प्रतिकूल परिस्थितियों में व्यक्ति को कछुए की तरह संयमित होकर अपने व्यवहार को सीमित रखना चाहिए। जिस प्रकार कछुआ खतरा महसूस होने पर अपने कवच में सिमट जाता है, उसी प्रकार व्यक्ति को भी नकारात्मक परिस्थितियों में धैर्य और आत्मसंयम बनाए रखना चाहिए। डॉ. द्विवेदी ने नियमित व्यायाम, विनम्रता और खुशमिजाज व्यवहार के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि हंसने-मुस्कुराने और सकारात्मक गतिविधियों से शरीर में डोपामाइन, ऑक्सीटोसिन, एंडोर्फिन और सेरोटोनिन जैसे रसायनों का स्राव सक्रिय होता है, जो मानसिक स्वास्थ्य और प्रसन्नता में सहायक हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को स्वयं को परिस्थितियों का शिकार मानने के बजाय भावनात्मक संतुलन बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही ऐसे लोगों के संपर्क में रहना चाहिए, जो सही सलाह, मार्गदर्शन और सहयोग दे सकें।

उन्होंने प्राणायाम में ओम के गुंजार, नमस्कार की भारतीय परंपरा तथा क्षमा मांगने और दूसरों को माफ करने के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की। जापानी संस्कृति में क्षमा और सहज व्यवहार को तनावमुक्त जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जाता है। विभिन्न व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने तनाव प्रबंधन के उपायों को समझाया। इस अवसर पर वरिष्ठ प्राध्यापक डा हेमवती ठाकुर, ग्रेस कुजूर, डा एके सिंह सेवानिवृत्त प्राध्यापक, रसायन शास्त्र, केपी कोसिमा, पल्लवी बरड़िया, डाॅ. वेदवती देवांगन, जयश्री पंचांगम, रश्मि कुजूर, डा सीमा साहू सहित महाविद्यालय के समस्त शैक्षणिक एवं अशैक्षणिक कर्मचारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन एवं संयोजन आईक्यूएसी प्रभारी डा तामेश्वरी साहू तथा प्राचार्य डा विनोद कुमार पाठक ने आभार व्यक्त किया।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा