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सूरजपुर में संविदा कर्मचारियों ने सरकार को याद दिलाई 'मोदी की गारंटी'

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सूरजपुर में संविदा कर्मचारियों ने सरकार को याद दिलाई 'मोदी की गारंटी'


सूरजपुर, 08 मई (हि.स.)। छत्तीसगढ़ में नियमितीकरण की मांग को लेकर संविदा कर्मचारियों ने एक बार फिर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। 'छत्तीसगढ़ सर्व विभागीय संविदा कर्मचारी महासंघ' की सूरजपुर इकाई ने अपनी लंबित मांगों को लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष को मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन के माध्यम से कर्मचारियों ने विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान किए गए वादों, विशेषकर भाजपा के संकल्प पत्र में शामिल 'मोदी की गारंटी' को पूरा करने की पुरजोर मांग की है। महासंघ ने स्पष्ट किया कि प्रदेश के हजारों परिवारों ने सेवा सुरक्षा और नियमितीकरण के भरोसे पर ही वर्तमान सरकार को अपना समर्थन दिया था, लेकिन सत्ता में आने के दो साल बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है जिससे कर्मचारियों में भारी निराशा है।

कर्मचारियों ने अपने विरोध में उन पुराने आश्वासनों को भी आधार बनाया है, जब वर्तमान सरकार के दिग्गज नेता डॉ. रमन सिंह, अरुण साव, ओ.पी. चौधरी, विजय शर्मा और केदार कश्यप विपक्ष में रहते हुए उनके मंच पर आए थे। उस समय इन नेताओं ने संविदा कर्मियों की मांगों को पूर्णतः न्यायोचित करार दिया था और सरकार बनते ही प्राथमिकता के आधार पर समाधान का वादा किया था। हालांकि, हकीकत इसके विपरीत नजर आ रही है। मार्च 2024 में सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति की सुस्त रफ्तार पर सवाल उठाते हुए महासंघ ने कहा कि दो वर्ष बीत जाने के बाद भी समिति की कोई ठोस रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है, जो कर्मचारियों के साथ विश्वासघात जैसा है।

अपनी मांगों को तर्कसंगत बनाने के लिए महासंघ ने पड़ोसी राज्यों की नीतियों का भी हवाला दिया है। ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि मध्य प्रदेश में संविदा कर्मचारियों को 62 वर्ष की आयु तक नौकरी की सुरक्षा, अनुकंपा नियुक्ति, समान कार्य-समान वेतन और नियमित पदों पर 50% आरक्षण जैसे लाभ मिल रहे हैं। इसी तरह राजस्थान, उत्तराखंड और हरियाणा ने भी ठोस नियमितीकरण नीतियां लागू की हैं। छत्तीसगढ़ के कर्मचारी भी इन्हीं तर्ज पर तत्काल नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू करने, समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने और एक स्पष्ट सेवा सुरक्षा नीति बनाने की मांग कर रहे हैं। संविदा कर्मचारियों का यह बढ़ता आक्रोश संकेत दे रहा है कि यदि समय रहते चुनावी वादों को धरातल पर नहीं उतारा गया, तो डबल इंजन की सरकार के लिए यह आंदोलन आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / पारस नाथ सिंह