सावन के तीसरे सोमवार पर डीपाडीह के प्राचीन शिवालय में उमड़ी आस्था, सदियों पुरानी विरासत बनी आकर्षण
-प्राचीन मंदिरों के अवशेषों के बीच विराजमान हैं भगवान शिव
बलरामपुर, 17 अगस्त (हि.स.)। सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। सावन के तीसरे सोमवार पर जिले के शिवालयों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है। इसी क्रम में बलरामपुर जिले के डीपाडीह स्थित प्राचीन मंदिर समूह में भी भक्त भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंच रहे हैं। यहां आस्था के साथ इतिहास भी जुड़ा है। सदियों पुराने मंदिरों के अवशेषों के बीच मौजूद शिवलिंग आज भी स्थानीय लोगों की श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है।
डीपाडीह का मंदिर परिसर कई किलोमीटर के क्षेत्र में फैले प्राचीन अवशेषों के कारण विशेष पहचान रखता है। अलग-अलग स्थानों से मिले मंदिरों और मूर्तियों के अवशेषों को एक जगह सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है। खुले परिसर में रखे ये पुरावशेष किसी संग्रहालय का एहसास कराते हैं।
सावन के सोमवार को भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। डीपाडीह में भी श्रद्धालु शिवलिंग पर जल और दूध अर्पित कर पूजा-अर्चना करते हैं। स्थानीय लोगों की आस्था है कि यहां सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं।महाशिवरात्रि और दशहरा के अवसर पर भी यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर परिसर में मेला आयोजित होता है, जिससे पूरे क्षेत्र में धार्मिक माहौल बन जाता है।
1987 में हुआ सर्वे, 1989 में शुरू हुई खुदाई
डीपाडीह के प्राचीन मंदिरों का सर्वे वर्ष 1987 में किया गया था। इसके दो साल बाद 1989 में यहां खुदाई का काम शुरू हुआ। खुदाई के दौरान अलग-अलग कालखंडों से संबंधित मंदिरों और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के अवशेष मिले।
जानकारों के अनुसार यहां मिले अवशेष इस बात के संकेत देते हैं कि प्राचीन समय में यह क्षेत्र धार्मिक और कलात्मक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। अलग-अलग काल और शासक वंशों से जुड़े मंदिरों की मौजूदगी डीपाडीह को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।
डीपाडीह में उरांव टोला शिव मंदिर, सामंत सरना प्रवेश द्वार और पंचायतन शैली के शिव मंदिर के अवशेष देखने को मिलते हैं। इसके अलावा महिषासुर मर्दिनी, लक्ष्मी, उमा-महेश्वर, भगवान विष्णु, कुबेर और कार्तिकेय की प्राचीन प्रतिमाएं भी यहां मौजूद हैं।पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और मूर्तियों की कलात्मक बनावट उस समय की शिल्पकला की समृद्धि को दर्शाती है। इन्हें देखने के लिए इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले लोग भी यहां पहुंचते हैं।
डीपाडीह परिसर में स्थापित विशाल शिवलिंग श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण है। आसपास छोटे-बड़े कई शिवलिंग भी दिखाई देते हैं। सामंत सरना समूह के अंतर्गत आने वाले प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग की आज भी स्थानीय लोग पूजा करते हैं।
सावन में श्रद्धालु यहां पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं और भगवान शिव से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बनी विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियां इसकी प्राचीन स्थापत्य शैली को और खास बनाती हैं।
इतिहास और आस्था की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के बावजूद डीपाडीह की प्राचीन धरोहरों की सुरक्षा चिंता का विषय है। परिसर में कई प्रतिमाएं खुले में रखी हुई हैं, जबकि कुछ को संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार अतीत में यहां से कुछ दुर्लभ मूर्तियां चोरी भी हो चुकी हैं।
स्थानीय निवासी दिनेश मरकाम ने कहा कि, प्राचीन मूर्तियों और मंदिरों के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए प्रशासन को ठोस व्यवस्था करनी चाहिए। यदि यहां सुरक्षा और संरक्षण की बेहतर व्यवस्था हो तथा पर्यटन सुविधाओं का विकास किया जाए तो डीपाडीह को धार्मिक और पुरातात्विक पर्यटन स्थल के रूप में नई पहचान मिल सकती है।
कई जनप्रतिनिधि भी इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाने की बात कह चुके हैं। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि प्रशासन और सरकार मिलकर इस विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में प्रभावी पहल करेंगे।
सावन के तीसरे सोमवार पर डीपाडीह में एक ओर श्रद्धालु प्राचीन शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मंदिरों के अवशेष और पुरानी प्रतिमाएं इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की कहानी बयां कर रही हैं। यही धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत का मेल डीपाडीह को बलरामपुर जिले के खास स्थलों में शामिल करता है।
हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय

