रक्षाबंधन पर राखियों के साथ आत्मनिर्भरता की नई डोर बुन रहीं ग्रामीण महिलाएं
धान, गेहूं और मक्का से तैयार राखियों की बढ़ी मांग, 7,020 राखियों की बिक्री से 60 हजार रुपये की आय
बलरामपुर, 23 अगस्त (हि.स.)।रक्षाबंधन के पर्व पर भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक राखी इस बार ग्रामीण महिलाओं के हुनर और आत्मनिर्भरता की कहानी भी बयां कर रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ी महिला स्व-सहायता समूहों की दीदियां स्थानीय कृषि उत्पादों धान, गेहूं और मक्का का रचनात्मक उपयोग कर आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं। स्थानीय संसाधनों से तैयार ये राखियां अब बाजार में लोगों की पसंद बन रही हैं।
कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी एवं जिला पंचायत सीईओ के मार्गदर्शन में महिला समूहों को स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग और आजीविका गतिविधियों से जोड़ने की दिशा में यह पहल की गई है। कृषि उत्पादों से राखियां तैयार कर महिलाएं अपने हुनर को बाजार तक पहुंचा रही हैं। इससे उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय का अवसर भी मिल रहा है।
7,020 राखियां तैयार, 60 हजार रुपये की बिक्री
एनआरएलएम से जुड़ी लक्ष्मी समूह की महिलाओं ने अब तक करीब 7,020 राखियां तैयार की हैं। इनमें से राखियों की बिक्री से लगभग 60 हजार रुपये की आय हो चुकी है। रक्षाबंधन पर्व को देखते हुए इन राखियों की मांग लगातार बनी हुई है। इससे महिला समूह की सदस्यों को उनकी मेहनत का आर्थिक लाभ मिल रहा है और आत्मनिर्भरता की दिशा में उनके कदम और मजबूत हो रहे हैं।
सी-मार्ट में उपलब्ध, सोमवार को लगेगा विशेष स्टॉल
महिला समूहों द्वारा तैयार की गई राखियां जिले के सी-मार्ट में बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। आम नागरिक यहां से इन स्थानीय राखियों की खरीद कर सकते हैं। इसके अलावा अधिक से अधिक लोगों तक इन उत्पादों को पहुंचाने के उद्देश्य से सोमवार को संयुक्त जिला कार्यालय परिसर में विशेष स्टॉल लगाया जाएगा। यहां अधिकारी-कर्मचारी और आम नागरिक महिला समूहों द्वारा तैयार राखियां खरीद सकेंगे।
राखी के साथ मजबूत हो रही आत्मनिर्भरता की डोर
एनआरएलएम के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को स्व-सहायता समूहों से जोड़कर विभिन्न आजीविका गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। धान, गेहूं और मक्का जैसे स्थानीय कृषि उत्पादों को उपयोगी एवं आकर्षक उत्पादों में बदलकर महिलाएं अपनी रचनात्मकता को बाजार से जोड़ रही हैं।
इन राखियों में भाई-बहन के रिश्ते की मिठास के साथ ग्रामीण महिलाओं की मेहनत, हुनर और आत्मनिर्भरता का भाव भी जुड़ा है। रक्षाबंधन पर इन स्थानीय राखियों की खरीद महिला समूहों के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के साथ स्थानीय संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देने में योगदान देगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय

