आधी आबादी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए राहुल गांधी को माता-बहनों से माफी मांगनी चाहिए : दीपिका शोरी
जगदलपुर, 23 अगस्त (हि.स.)। छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग की सदस्य, बस्तर संभागीय प्रभारी दीपिका शोरी ने पुणे में महिलाओं को लेकर राहुल गांधी के बयान पर उन्होंने कहा कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर भारतीय परिवार व्यवस्था और रिश्तों को कमजोर करने वाली सोच को बढ़ावा देना उचित नहीं है।
उन्हाेंने कहा कि भारतीय संस्कृति में बेटी, बहन, पत्नी और मां होना किसी महिला की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके सम्मान और सामाजिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। महिला की स्वतंत्रता और उसके अधिकारों का समर्थन होना चाहिए, लेकिन इसके नाम पर परिवार और रिश्तों को महिला के विरुद्ध खड़ा करना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के नाम पर राजनीति करने वालों को यह समझना होगा कि भारतीय महिला कमजोर नहीं है; वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी है और अपने परिवार एवं समाज की मजबूत आधार शिला भी है। ऐसे में देश की आधी आबादी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले इस बयान के लिए राहुल गांधी को देश की माता-बहनों से माफी मांगनी चाहिए।
दीपिका शोरी ने कहा कि राहुल गांधी ने महिलाओं को पिता, पति और पुत्र से अलग पहचान देने की बात कही है। महिला की अपनी पहचान और अधिकारों पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन महिला की स्वतंत्रता का अर्थ परिवार से दूरी या पारिवारिक रिश्तों को नकारना नहीं हो सकता। भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत ही परिवार, संस्कार और आपसी सम्मान की भावना है। दीपिका शोरी ने कहा कि यदि महिलाओं के सम्मान की बात करनी है, तो राजनीति से ऊपर उठकर महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार, समान अवसर और न्याय के मुद्दों पर ठोस काम होना चाहिए। केवल राजनीतिक मंचों से परिवार और सामाजिक व्यवस्था पर टिप्पणी करने से महिला सशक्तिकरण नहीं होगा।
उन्होंने राहुल गांधी से सवाल करते हुए कहा कि क्या भारतीय नारी की स्वतंत्र पहचान स्थापित करने के लिए उसके पारिवारिक रिश्तों को ही कटघरे में खड़ा करना जरूरी है? देश की महिलाएं अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा रही हैं। दीपिका ने कहा कि महिला को परिवार से लड़ाने की राजनीति नहीं, बल्कि परिवार और समाज में महिला को बराबरी और सम्मान दिलाने की राजनीति होनी चाहिए। भारतीय नारी को किसी राजनीतिक विचारधारा के चश्मे से देखने के बजाय उसके सामर्थ्य, सम्मान और स्वाभिमान को केंद्र में रखा जाना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

