कुम्हारों के चाक ने पकड़ी रफ्तार, मिट्टी में अब भी जिंदा है पुरखों की कला
बलरामपुर, 08 अक्टूबर (हि.स.)। नवरात्र और दीपावली की आहट के साथ रामानुजगंज में कुम्हारों के घरों में चाक की रफ्तार बढ़ गई है। आज गुरुवार को जहां बाजारों में त्योहारों की तैयारियां तेज हो रही हैं, वहीं कुम्हार परिवार मिट्टी को आकार देकर दीये, कलश, ढक्कन और चुकला तैयार करने में जुटे हैं। बदलते दौर में प्लास्टिक और आधुनिक सामानों ने मिट्टी के कई उत्पादों की जगह भले ही ले ली हो, लेकिन त्योहारों में मिट्टी के दीयों और कलश की मांग आज भी इस पारंपरिक कला को जिंदा रखे हुए है।
रामानुजगंज के कई कुम्हार परिवारों के लिए यह काम केवल परंपरा नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका का मुख्य आधार है। सुबह से शाम तक चाक पर मिट्टी को आकार देने, उसे सुखाने और फिर पकाने का काम चलता है। हालांकि इस परंपरागत कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कुम्हारों को इलेक्ट्रॉनिक चाक, मिट्टी की उपलब्धता और बेहतर बाजार जैसी सुविधाओं की जरूरत महसूस हो रही है।
रामानुजगंज के कुम्हार चिकनी मिट्टी से दीये, कलश और पूजा सामग्री के साथ कई तरह के घरेलू सामान तैयार करते हैं। कई परिवार आज भी पारंपरिक सीमेंट के चाक का इस्तेमाल करते हैं, जिसे हाथ से घुमाकर मिट्टी को आकार दिया जाता है। कभी इसी चाक पर मटके, घड़े, कड़ाही, खपड़े और घरेलू उपयोग की अनेक वस्तुएं तैयार होती थीं।
समय के साथ प्लास्टिक, सीमेंट और आधुनिक सामानों का चलन बढ़ा तो मिट्टी से बने कई उत्पादों की मांग कम हो गई। इसके बावजूद नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों में मिट्टी के दीयों और कलश की मांग बनी रहती है। यही मांग कुम्हार परिवारों को अपनी पुश्तैनी कला से जोड़े हुए है।
एक समय रामानुजगंज और आसपास के गांवों में मिट्टी के खपड़ैल वाले घर आम हुआ करते थे। गर्मी में इन घरों के भीतर अपेक्षाकृत ठंडक रहती थी। कुम्हार परिवार खपड़ैल बनाकर भी अपनी आजीविका चलाते थे। लेकिन पक्के मकानों और सीमेंट की चादरों का चलन बढ़ने के साथ खपड़ैल की मांग लगभग खत्म हो गई।
अब गांवों में कहीं-कहीं पुराने खपड़ैल वाले मकान ही इस परंपरा की याद दिलाते हैं। कुम्हारों का कहना है कि खपड़ैल का काम लगभग बंद हो चुका है और उनका कारोबार अब मुख्य रूप से दीये, कलश और दूसरी छोटी मिट्टी की वस्तुओं तक सीमित रह गया है।
रामानुजगंज के वार्ड क्रमांक एक निवासी कुम्हार संतोष प्रजापति बताते हैं कि उनके पूर्वज भी मिट्टी के सामान बनाकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। आज उनकी अगली पीढ़ी भी इसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है। वे दशहरा और दीपावली के लिए दीये, ढक्कन और चुकला बनाने के साथ शादी-विवाह के लिए कलश तैयार करते हैं।
संतोष प्रजापति के अनुसार पारंपरिक चाक पर काम करना काफी मेहनत वाला है। सीमेंट का चाक भारी होता है और उसे लंबे समय तक हाथ से घुमाना पड़ता है। उनका कहना है कि शासन की ओर से इलेक्ट्रॉनिक चाक उपलब्ध कराया जाए तो कम समय में अधिक सामान तैयार किया जा सकेगा और मेहनत भी कम होगी।
वार्ड क्रमांक एक निवासी बालकेश्वर प्रजापति माटी कला बोर्ड के ब्लॉक अध्यक्ष हैं। उन्होंने बताया कि कुम्हारों के सामने चिकनी मिट्टी की उपलब्धता भी बड़ी समस्या है। दीये और दूसरे सामान बनाने के लिए उपयुक्त मिट्टी की जरूरत होती है, जिसे कई बार खरीदना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि रामानुजगंज में अभी बहुत कम कुम्हारों को इलेक्ट्रॉनिक चाक मिला है। अधिकांश परिवार पारंपरिक चाक पर ही निर्भर हैं। इस संबंध में शासन को आवेदन दिया गया है। उन्होंने कुम्हार परिवारों के लिए मिट्टी उपलब्ध कराने के लिए जमीन की व्यवस्था करने की मांग की है, ताकि माटी की यह कला आगे भी जीवित रह सके।
त्योहारों के मौसम में बारिश ने कुम्हारों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। मिट्टी से तैयार दीये, कलश और दूसरे सामान को अच्छी तरह सुखाने के लिए धूप जरूरी है। लगातार बारिश और धूप कम निकलने से सामान सूखने में अधिक समय लग रहा है, जिससे उत्पादन की गति प्रभावित हो रही है।
इसके बावजूद कुम्हार परिवार त्योहारों की मांग पूरी करने में जुटे हैं। चाक पर घूमती मिट्टी के साथ वे सिर्फ दीये और कलश नहीं बना रहे, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही अपनी पुश्तैनी कला को भी आगे बढ़ा रहे हैं। सुविधाएं मिलें तो यह कला सिर्फ त्योहारों तक सीमित न रहकर नई पीढ़ी के लिए रोजगार का बेहतर माध्यम भी बन सकती है।
हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय

