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अहिंसा, संयम और क्षमा से आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त : साध्वी रत्ननिधि

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अहिंसा, संयम और क्षमा से आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त : साध्वी रत्ननिधि


अहिंसा, संयम और क्षमा से आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त : साध्वी रत्ननिधि


धमतरी, 30 अगस्त (हि.स.)। धर्मनगरी धमतरी के श्री पार्श्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में विगत 28 जुलाई चातुर्मास के अवसर पर धार्मिक आयोजनों का सिलसिला श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में जारी है। जैन मंदिर में साध्वी रत्ननिधि श्री जी महाराज साहेब आदि ठाणा-4 के सानिध्य में प्रतिदिन धर्मसभा एवं विभिन्न धार्मिक आयोजन हो रहे हैं।

रविवार को धर्मसभा में साध्वी रत्ननिधि ने कहा कि जैन धर्म मनुष्य को बाहरी सुखों के पीछे भागने के बजाय आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता है। जीवन में वास्तविक शांति तभी संभव है, जब व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ को कम करने का प्रयास करे। उन्होंने कहा कि अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को शारीरिक पीड़ा न पहुंचाना नहीं है, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार में भी करुणा का भाव रखना है। कटु वचन भी किसी के मन को चोट पहुंचा सकते हैं, इसलिए बोलने से पहले विचार करना आवश्यक है। संयम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता। मनुष्य जितना अधिक इच्छाओं के पीछे भागता है, उतना ही अशांत होता जाता है, जबकि संतोष और संयम जीवन को सरल एवं सुखमय बनाते हैं। क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता और लोभ के स्थान पर संतोष को अपनाना आत्मविकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रतिदिन कुछ समय स्वाध्याय, ध्यान और आत्मचिंतन के लिए निकालने का आह्वान करते हुए कहा कि दूसरों की कमियां तलाशने के बजाय स्वयं के भीतर झांककर अपने कर्मों का निरीक्षण करना चाहिए। यही आत्मचिंतन जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बनता है। साध्वी रत्ननिधि ने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य जीवन में परिवर्तन लाना है। जब हमारे व्यवहार से किसी को पीड़ा न पहुंचे, मन में द्वेष समाप्त हो और प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री व करुणा का भाव जागृत हो, तभी धर्म वास्तव में जीवन में उतरता है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने उपस्थित होकर प्रवचन का श्रवण किया और आत्मकल्याण की प्रेरणा प्राप्त की।

हिन्दुस्थान समाचार / रोशन सिन्हा