कोरबा : महिला शक्ति और वनोपज का सशक्त उदाहरण बना हरिबोल स्व सहायता समूह
कोरबा, 05 फरवरी (हि.स.)। ग्रामीण अंचलों में वनोपज आधारित आजीविका लंबे समय से महिलाओं के जीवन और आर्थिक संरचना का अहम हिस्सा रही है। पारंपरिक ज्ञान, संगठित प्रयास, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ाव मिलने पर यही वनोपज महिला स्वावलंबन, स्वास्थ्य सेवा और सतत रोजगार का मजबूत आधार बन जाते हैं। इस दिशा में कोरबा जिले के डोंगानाला स्थित हरिबोल स्व सहायता समूह ने महिला सशक्तिकरण और आर्थिक आत्मनिर्भरता की एक सशक्त मिसाल प्रस्तुत की है।
वर्ष 2006-07 में यूरोपियन कमीशन परियोजना के अंतर्गत गठित हरिबोल स्व सहायता समूह आज 12 महिला सदस्यों के साथ वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र, डोंगानाला का सफल संचालन कर रहा है। समूह की महिलाएं स्वयं जंगलों से कच्ची वनौषधियों का संग्रहण करती हैं और वैज्ञानिक पद्धति से उनका प्रसंस्करण एवं विपणन करती हैं। समूह द्वारा तैयार की जा रही वनौषधियों की मांग स्थानीय स्तर के साथ-साथ प्रदेश स्तर पर भी निरंतर बनी हुई है।
समूह द्वारा उत्पादित वनौषधियों का विक्रय एनडब्ल्यूएफपी मार्ट बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, कांकेर, अंबिकापुर, जगदलपुर सहित संजीवनी केंद्र केवची (कटघोरा) और कोरबा में किया जा रहा है। इसके साथ ही प्रसंस्करण केंद्र में कार्यरत वैद्य द्वारा स्थानीय एवं आसपास के क्षेत्रों के 1500 से अधिक मरीजों का सफल उपचार किया जा चुका है। इनमें वातरोग, बवासीर, पथरी, उदररोग, बांझपन, सिरदर्द, ज्वर, चर्मरोग, लकवा, टीबी, सफेद पानी सहित अनेक रोग शामिल हैं।
हरिबोल स्व सहायता समूह द्वारा हिंगवाष्टक चूर्ण, अजमोदादि चूर्ण, अश्वगंधादि चूर्ण, सितोपलादि चूर्ण, अविपत्तिकर चूर्ण, बिल्वादि चूर्ण, पुष्यानुग चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, पंचसम चूर्ण, शतावरी चूर्ण, आमलकी चूर्ण, पायोकिल दंतमंजन, सर्दी-खांसी नाशक चूर्ण, हर्बल कॉफी चूर्ण, महिला मित्र चूर्ण, हर्बल मधुमेह नाशक चूर्ण, हर्बल फेसपैक चूर्ण और हर्बल केशपाल चूर्ण जैसे अनेक उत्पादों का निर्माण किया जा रहा है।
आर्थिक दृष्टि से भी समूह ने उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्तमान में समूह की वार्षिक आय 20.52 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है, जबकि प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख रुपये की वनौषधियों का विक्रय किया जा रहा है। इससे प्रत्येक सदस्य को औसतन 1.71 लाख रुपये प्रति वर्ष की आय प्राप्त हो रही है। बीते दो वर्षों में समूह का विक्रय और लाभ दोनों दोगुने हुए हैं। जहां पहले वार्षिक लाभ 10.68 लाख रुपये था, वह अब बढ़कर 20.52 लाख रुपये हो गया है।
वन मंडलाधिकारी कटघोरा कुमार निशांत ने बताया कि यह वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र समूह से जुड़ी महिलाओं को स्थायी रोजगार, आत्मनिर्भरता और आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर रहा है। महिलाएं अपनी आय से बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य उपचार, घरेलू आवश्यकताओं और त्योहारों के खर्च सहजता से पूरा कर पा रही हैं। साथ ही मासिक अंशदान के माध्यम से आपसी सहयोग, ऋण व्यवस्था और सामाजिक सहभागिता भी सशक्त हुई है।
हरिबोल स्व सहायता समूह की उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। वर्ष 2008 में समूह को फिलिप्स बहादुरी पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अलावा वर्ष 2020-21 में भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन संघ (ट्राइफेड), भारत सरकार द्वारा वनधन विकास केंद्र, डोंगानाला को राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतम प्रकार के वनोत्पाद निर्माण एवं विपणन के लिए प्रथम पुरस्कार तथा अधिकतम विक्रय के लिए द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा द्वारा प्रदान किया गया।
हरिबोल स्व सहायता समूह की यह सफलता इस बात का सशक्त प्रमाण है कि जब महिलाओं के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक प्रसंस्करण तकनीक और मजबूत विपणन व्यवस्था से जोड़ा जाता है, तो वनोपज न केवल आजीविका का साधन बनते हैं, बल्कि ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण की मजबूत नींव भी तैयार करते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार/हरीश तिवारी
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हिन्दुस्थान समाचार / हरीश तिवारी

